वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र २९ ] अध्याय १ १३७
परिपश्यन्ति धीराः' (मु० उ० १। १। ६) - 'उस समस्त प्राणियोंकी योनि (उपादान कारण) - को ज्ञानीजन सर्वत्र परिपूर्ण देखते हैं।' इस प्रकार स्पष्ट शब्दोंमें परब्रह्म परमात्माको समस्त भूत-प्राणियोंकी 'योनि' बताया गया है; इसलिये वही सम्पूर्ण जगत्का उपादान कारण है। 'यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च' (मु० उ० १। १। ७) इत्यादि मन्त्रके द्वारा यह बताया गया है कि 'जैसे मकड़ी अपने शरीरसे ही जालेको बनाती और फिर उसीमें निगल लेती है, उसी प्रकार अक्षरब्रह्मसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रकट होता है।' इसके अनुसार भी यही सिद्ध होता है कि एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही इस जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का निमित्त और उपादान कारण है। अतः यह समस्त चराचर विश्व भगवान्का ही स्वरूप है। ऐसा समझकर मनुष्यको उनके भजन-स्मरणमें लग जाना चाहिये और सबके साथ व्यवहार करते समय भी इस बातको सदा ध्यानमें रखना चाहिये। सम्बन्ध-इस प्रकार अपने मतकी स्थापना और अपनेसे विरुद्ध मतोंका खण्डन करनेके पश्चात् इस अध्यायके अन्तमें सूत्रकार कहते हैं- एतेन सर्वे व्याख्याता व्याख्याताः ॥ १। ४। २९ ॥ एतेन = इस विवेचनसे; सर्वे व्याख्याताः = सभी पूर्वपक्षियोंके प्रश्नोंका उत्तर दे दिया गया; व्याख्याताः = उत्तर दे दिया गया। व्याख्या-इस प्रकार विवेचनपूर्वक यह सिद्धान्त स्थिर कर दिया गया कि 'ब्रह्म ही जगत्का उपादान और निमित्त कारण है; सांख्यकथित प्रधान (जडप्रकृति) नहीं।' इस विवेचनसे प्रधानकारणवादी सांख्योंकी ही भाँति परमाणुकारणवादी नैयायिक आदिके मतोंका भी निराकरण कर दिया गया- यह सूत्रकार स्पष्ट शब्दोंमें घोषित करते हैं। 'व्याख्याताः' पदको दो बार प्रयोग अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है। चौथा पाद सम्पूर्ण श्रीवेदव्यासरचित वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र)-का पहला अध्याय पूरा हुआ।