वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextश्रीपरमात्मने नमः दूसरा अध्याय पहला पाद सम्बन्ध—पहले अध्यायमें यह सिद्ध किया गया कि समस्त वेदान्तवाक्य एक स्वरसे परब्रह्म परमेश्वरको ही जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण बताते हैं। इसीलिये उस अध्यायको ‘समन्वयाध्याय’ कहते हैं। ब्रह्म ही सम्पूर्ण विश्वका कारण है; इस विषयको लेकर श्रुतियोंमें कोई मतभेद नहीं है। प्रधान आदि अन्य जडवर्गको कारण बतानेवाले सांख्य आदिके मतोंको शब्दप्रमाणशून्य बताकर तथा अन्य भी बहुत-से हेतु देकर उनका निराकरण किया गया है। अब यह सिद्ध करनेके लिये कि श्रुतियोंका न तो स्मृतियोंसे विरोध है और न आपसमें ही एक श्रुतिसे दूसरी श्रुतिका विरोध है; यह ‘अविरोध’ नामक दूसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले सांख्यवादीकी ओरसे शंका उपस्थित करके सूत्रकार उसका समाधान करते हैं— स्मृत्यनवकाशदोषप्रसंग इति चेन्नान्यस्मृत्य- नवकाशदोषप्रसंगात् ॥ २ । १ । १ ॥ चेत् = यदि कहो; स्मृत्यनवकाशदोषप्रसंगः = प्रधानको जगत्का कारण न माननेसे सांख्यस्मृतिको अवकाश (मान्यता) न देनेका दोष उपस्थित होगा; इति न = तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; अन्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसंगात् = क्योंकि उसको मान्यता देनेपर दूसरी अनेक स्मृतियोंको मान्यता न देनेका दोष आता है। व्याख्या—‘‘यदि कहा जाय कि ‘प्रधान’ को जगत्का कारण न मानकर ‘ब्रह्म’ को ही माना जायगा तो सर्वज्ञ कपिल ऋषिद्वारा बनायी हुई सांख्यस्मृति- को अवकाश न देनेका—उसे प्रमाण न माननेका प्रसंग आयेगा, इसलिये