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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

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सूत्र १९ ] अध्याय २ १८७ एक-एक दूसरे-दूसरेके कारण होते हैं, अतः इन्हींसे समुदायकी सिद्धि हो सकती है; इति न = तो यह ठीक नहीं है; उत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् = क्योंकि ये अविद्या आदि उत्तरोत्तरकी उत्पत्तिमात्रमें ही निमित्त माने गये हैं (समुदाय या संघातमें नहीं; अतः इनसे भी समुदायकी सिद्धि नहीं हो सकती)। व्याख्या—बौद्धशास्त्रमें विज्ञानसंततिके कुछ हेतु माने गये हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं—अविद्या, संस्कार, विज्ञान, नाम, रूप, षडायतन स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरा, मरण, शोक, परिदेवना, दुःख तथा दुर्मनस्ता आदि क्षणिक वस्तुओंमें नित्यता और स्थिरता आदिका जो भ्रम है, वही ‘अविद्या’ कहलाता है। यह अविद्या विषयोंमें रागादिरूप ‘संस्कार’ उत्पन्न करनेमें कारण बनती है। वह संस्कार गर्भस्थ शिशुमें आलय ‘विज्ञान’ उत्पन्न करता है। उस आलय-विज्ञानसे पृथिवी आदि चार भूत होते हैं, जो शरीर एवं समुदायके कारण हैं। वही नामका आश्रय होनेसे ‘नाम’ भी कहा गया है। वह नाम ही श्याम-गौर आदि रूपवाले शरीरका उत्पादक होता है। गर्भस्थ शरीरकी जो कलल-बुद्बुद आदि अवस्थाएँ हैं, उन्हींको नाम तथा ‘रूप’ शब्दका वाच्य कहा गया है। पृथिवी आदि चार भूत, नाम, रूप, शरीर, विज्ञान और धातु—ये छः जिनके आश्रय हैं, उन इन्द्रियोंके समूहको ‘षडायतन’ कहा गया है। नाम, रूप तथा इन्द्रियोंके परस्पर सम्बन्धका नाम ‘स्पर्श’ है। उससे सुख आदिकी ‘वेदना’ (अनुभूति) होती है। उससे क्रमशः तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरावस्था, मृत्यु, शोक, परिदेवना तथा दुर्मनस्ता (मनकी उद्विग्नता) आदि भी इसी प्रकार उत्पन्न होते हैं। तत्पश्चात् पुनः अविद्या आदिके क्रमसे पूर्वोक्त सभी बातें प्रकट होती रहती हैं। ये घटीयन्त्र (रहट)-की भाँति निरन्तर चक्कर लगाते हैं, अतः यदि इस मान्यताको लेकर कहा जाय कि इन्हींसे समुदायकी भी सिद्धि हो जाती है तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि पूर्वोक्त अविद्या आदिमेंसे जो पूर्ववर्ती है, वह बादमें कहे हुए संस्कार आदिकी उत्पत्तिमात्रमें कारण होता है, संघातकी उत्पत्तिमें नहीं; अतः उसकी सिद्धि असम्भव है।