वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context१८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध— पूर्वसूत्रमें यह बात बतायी गयी कि अविद्या आदि हेतु संस्कार आदिकी उत्पत्तिमात्रमें ही निमित्त माने गये हैं, अतः उनसे संघात (समुदाय)- की सिद्धि नहीं हो सकती। अब यह सिद्ध करते हैं कि वे अविद्या आदि हेतु संस्कार आदि भावोंकी उत्पत्तिमें भी निमित्त नहीं हो सकते— उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ॥ २।२।२०॥ च=तथा; उत्तरोत्पादे=बादमें होनेवाले भावकी उत्पत्तिके समय; पूर्वनिरोधात्=पहले क्षणमें विद्यमान कारणका नाश हो जाता है, इसलिये (पूर्वोक्त अविद्या आदि हेतु, संस्कार आदि उत्तरोत्तर भावोंकी उत्पत्तिमें कारण नहीं हो सकते)। व्याख्या—घट और वस्त्र आदिमें यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि कारणभूत मृत्तिका और तन्तु आदि अपने कार्यके साथ विद्यमान रहते हैं। तभी उनमें कार्य-कारणभावकी सिद्धि होती है; किंतु बौद्धमतमें समस्त पदार्थोंका प्रत्येक क्षणमें नाश माना गया है, अतः उनके मतानुसार कार्यमें कारणकी विद्यमानता सिद्ध नहीं होगी। जिस क्षणमें कार्यकी उत्पत्ति होगी, उसी क्षणमें कारणका निरोध अर्थात् विनाश हो जायगा; इसलिये उनकी मान्यताके अनुसार कारण-कार्यभावकी सिद्धि न होनेसे वे अविद्या आदि हेतु, संस्कार आदि उत्तरोत्तर भावोंकी उत्पत्तिके कारण नहीं हो सकते। सम्बन्ध—कारणके न रहनेपर भी कार्यकी उत्पत्ति मान लें तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा ॥ २।२।२१॥ असति=कारणके न रहनेपर (भी कार्यकी उत्पत्ति माननेसे); प्रतिज्ञोपरोधः=प्रतिज्ञा भंग होगी; अन्यथा=नहीं तो; यौगपद्यम्=कारण और कार्यकी एक कालमें सत्ता माननी पड़ेगी। व्याख्या—बौद्धमतमें चार हेतुओंसे विज्ञानकी उत्पत्ति मानी गयी है,