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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

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( १७ ) सूत्र विषय पृष्ठ कही हुई बातोंके अन्यत्र अध्याहार करनेका कथन, उद्देश्यकी एकता होनेपर विद्याओंमें भेदका अभाव, ब्रह्मविद्यासे भिन्न विद्याओंकी एकता या भिन्नताके निर्णयमें संज्ञा आदि हेतुओंके उपयोगका कथन .............................. ३१६—३२४ ११—१८ ब्रह्मके 'आनन्द' आदि धर्मोंका ही अन्यत्र अध्याहार उचित, 'प्रियाशिरस्त्व' रूपकगत धर्मोंका नहीं, आनन्दमयकी ब्रह्मरूपता, विरोध-परिहार तथा अन्न-रसमय पुरुषके ब्रह्म न होनेका प्रतिपादन .................................... ३२४—३२९ १९—२५ एक शाखामें कही विद्याकी एकता, नेत्र एवं सूर्य- मण्डलवर्ती पुरुषोंके नाम और गुणका एक-दूसरेमें अध्याहारकी अनावश्यकता, उक्त पुरुषोंमें ब्रह्मके सर्वाधारता और सर्वव्यापकता आदि धर्मोंके अध्याहारका निषेध तथा पुरुष विद्यामें प्रतिपादित दिव्य गुणोंके और कठवर्णित वेध्यत्व आदि धर्मोंके अन्यत्र अध्याहारका अनौचित्य ............... ३३०—३३५ २६ ब्रह्मविद्याके फल-वर्णनमें हानि (दुःखनाश आदि) और प्राप्ति (परमपदकी प्राप्ति आदि), दोनों प्रकारके फलोंका सर्वत्र सम्बन्ध .............................................. ३३५—३३७ २७—३२ ब्रह्मलोकमें जानेवाले ज्ञानी महात्माके पुण्य और पापोंकी यहीं समाप्ति, संकल्पानुसार ब्रह्मलोक-गमन या यहीं ब्रह्म-सायुज्यकी प्राप्ति सम्भव, ब्रह्मलोक जानेवाले सभी उपासकोंके लिये देवयानमार्गसे गमनका नियम, किंतु कारकपुरुषोंके लिये इस नियमका अभाव .................. ३३८—३४२ ३३—४१ अक्षरब्रह्मके लक्षणोंका सर्वत्र ब्रह्मके वर्णनमें अध्याहार आवश्यक, मुण्डक, कठ और श्वेताश्वतर आदिमें जीव और ईश्वरको एक साथ हृदयमें स्थित बतानेवाली विद्याओंकी एकता, ब्रह्म जीवात्माका भी अन्तर्यामी आत्मा है, इसमें विरोधका परिहार, जीव और ब्रह्मके भेदकी औपाधिकताका निराकरण एवं विरोध-परिहार ... ३४२—३५१