वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context( १८ ) सूत्र विषय पृष्ठ ४२—५२ ब्रह्मलोकमें जानेवाले सभी पुरुषोंके लिये भोग भोगनेका अनिवार्य नियम नहीं, बन्धनसे मुक्त होना ही विद्याका मुख्य फल, कर्मसे मुक्तिका प्रतिपादन करनेवाले पूर्वपक्षका उल्लेख और खण्डन, ब्रह्मविद्यासे ही मुक्तिका प्रतिपादन तथा साधकोंके भावानुसार विद्याके आनुषंगिक फलमें भेद ....... ३५२—३६१ ५३-५४ शरीरसे भिन्न आत्माकी सत्ता न माननेवाले नास्तिक- मतका खण्डन ............................................ ३६१-३६२ ५५—६० यज्ञांगसम्बन्धी उपासना प्रत्येक वेदकी शाखावालोंके लिये अनुष्ठेय है, एक-एक अंगकी अपेक्षा सब अंगोंसे पूर्ण उपासना श्रेष्ठ है, शब्दादि भेदसे विद्याओंमें भिन्नता है, फल एक होनेसे साधककी इच्छाके अनुसार उनके अनुष्ठानमें विकल्प हैं; किंतु भिन्न-भिन्न फलवाली उपासनाओंके अनुष्ठानमें कामनाके अनुसार एकाधिक उपासनाओंका समुच्चय भी हो सकता है—इन सब बातोंका वर्णन .................... ३६३—३६६ ६१—६६ यज्ञांगसम्बन्धी उपासनाओंमें समुच्चय या समाहारका खण्डन .................................................... ३६६—३६९ चौथा पाद १ ज्ञानसे ही परम पुरुषार्थकी सिद्धि .............................. ३७० २—७ ‘विद्या कर्मका अंग है’ जैमिनिके इस मतका उल्लेख .... ३७१—३७३ ८—१७ जैमिनिके उक्त मतका खण्डन तथा ‘विद्या कर्मका अंग नहीं, ब्रह्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है’ इस सिद्धान्तकी पुष्टि ...... ३७४—३८० १८—२० पूर्वपक्षके खण्डनपूर्वक संन्यास आश्रमकी सिद्धि ......... ३८०—३८३ २१-२२ अपूर्व फलदायिनी उद्गीथ आदि उपासनाओंका विधान .. ३८३-३८४ २३-२४ उपनिषद्वर्णित कथाएँ विद्याका ही अंग हैं, यज्ञका नहीं, इसका प्रतिपादन .................................... ३८५-३८६ २५ ब्रह्मविद्यारूप यज्ञमें अग्नि, ईंधन आदिकी अपेक्षाका अभाव ..................................................... ३८६