वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ इस विचित्र विश्वके जन्म आदि जिससे होते हैं अर्थात् जो सर्वशक्तिमान् परात्पर परमेश्वर अपनी अलौकिक शक्तिसे इस सम्पूर्ण जगत्की रचना करता है, इसका धारण, पोषण तथा नियमितरूपसे संचालन करता है; फिर प्रलयकाल आनेपर जो इस समस्त विश्वको अपनेमें विलीन कर लेता है, वह परमात्मा ही ब्रह्म है। भाव यह है कि देवता, दैत्य, दानव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि अनेक जीवोंसे परिपूर्ण, सूर्य, चन्द्रमा, तारा तथा नाना लोक- लोकान्तरोंसे सम्पन्न इस अनन्त ब्रह्माण्डका कर्ता-हर्ता कोई अवश्य है, यह हरेक मनुष्यकी समझमें आ सकता है; वही ब्रह्म है। उसीको परमेश्वर, परमात्मा और भगवान् आदि विविध नामोंसे कहते हैं; क्योंकि वह सबका आदि, सबसे बड़ा, सर्वाधार, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर सर्वव्यापी और सर्वरूप है। यह दृश्यमान जगत् उसकी अपार शक्तिके किसी एक अंशका दिग्दर्शनमात्र है। शंका—उपनिषदोंमें तो ब्रह्मका वर्णन करते हुए उसे अकर्ता, अभोक्ता, असंग, अव्यक्त, अगोचर, अचिन्त्य, निर्गुण, निरंजन तथा निर्विशेष बताया गया है और इस सूत्रमें उसे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलयका कर्ता बताया गया है। यह विपरीत बात कैसे? समाधान—उपनिषदोंमें वर्णित परब्रह्म परमेश्वर इस सम्पूर्ण जगत्का कर्ता होते हुए भी अकर्ता है (गीता ४। १३)। अतः उसका कर्तापन साधारण जीवोंकी भाँति नहीं है; सर्वथा अलौकिक है। वह सर्वशक्तिमान्* एवं सर्वरूप होनेमें समर्थ होकर भी सबसे सर्वथा अतीत और असंग है। सर्वगुणसम्पन्न होते हुए भी निर्गुण
- परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥ (श्वेता० ६। ८) 'इस परमेश्वरकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक दिव्य शक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है।'