वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context३४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध—'वसिष्ठ और व्यास आदि जो अधिकारप्राप्त ऋषिगण हैं; उनकी अर्चिमार्गसे गति होती है या वे इसी शरीरसे ब्रह्मलोकतक जा सकते हैं?' इसपर कहते हैं— यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम्॥ ३। ३। ३२॥ आधिकारिकाणाम्=जो अधिकारप्राप्त कारक पुरुष हैं, उनकी; यावदधिकारम्=जबतक अधिकारकी समाप्ति नहीं होती तबतक; अवस्थितिः= अपने इच्छानुसार स्थिति रहती है। व्याख्या—जो वसिष्ठ तथा व्यास आदि महापुरुष अधिकार लेकर परमेश्वरकी आज्ञासे यहाँ जगत्का कल्याण करनेके लिये आते हैं, उन कारक पुरुषोंका न तो साधारण जीवोंकी भाँति जाना-आना होता है और न जन्मना-मरना ही होता है। उनकी सभी क्रियाएँ साधारण जीवोंसे विलक्षण एवं दिव्य होती हैं। वे अपने इच्छानुसार शरीर धारण करनेमें समर्थ होते हैं, अतः उनके लिये अर्चि आदि देवताओंकी सहायता आवश्यक नहीं है। जबतक उनका अधिकार रहता है, तबतक वे इस जगत्में आवश्यकतानुसार सभी लोकोंमें स्वतन्त्रतापूर्वक जा सकते हैं, अन्तमें परमात्मामें विलीन हो जाते हैं। इसलिये अन्य साधक या मुक्त पुरुष उनके समान नहीं हो सकते। सम्बन्ध— बत्तीसवें सूत्रतक ब्रह्मलोक और परमात्माकी प्राप्तिके विषयमें आयी हुई श्रुतियोंपर विचार किया गया। अब ब्रह्म और जीवके स्वरूपका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अक्षरधियां त्ववरोधः सामान्यतद्भावाभ्यामौपसदव- त्तदुक्तम्॥ ३। ३। ३३॥ अक्षरधियाम्=अक्षर अर्थात् परमात्माके निर्गुण-निराकार-विषयक लक्षणोंका; तु=भी; अवरोधः=सब जगह अध्याहार करना (उचित है); सामान्य- तद्भावाभ्याम्=क्योंकि ब्रह्मके सभी विशेषण समान हैं तथा उसीके स्वरूपको