वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र ३७ ] अध्याय ३ ३४७ अंशद्वारा कार्यकारणकी एकता समझायी, उसके बाद (छा० उ० ६।८।७ से ६। १६। ३ तक) नौ बार पृथक्-पृथक् दृष्टान्त देकर प्रत्येकके अन्तमें यह बात कही है कि 'स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो' 'यह जो अणिमा अर्थात् अत्यन्त सूक्ष्म परमात्मा है, इसीका स्वरूप यह समस्त जगत् है, वही सत्य है; वह आत्मा है और वह तू है अर्थात् कार्य और कारणकी भाँति तेरी और उसकी एकता है।' उसी प्रकार सब जगह समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध - यदि परमात्मा और जीवात्माका उपाधिकृत भेद और वास्तविक अभेद मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत् ॥ ३।३।३७॥ व्यतिहारः = परस्पर व्यत्यय करके अभेदका वर्णन है, इसलिये उपाधिकृत भेद सिद्ध नहीं होता; हि= क्योंकि; इतरवत् = सभी श्रुतियाँ दूसरेकी भाँति; विशिंषन्ति = विशेषण देकर वर्णन करती हैं। व्याख्या - परमात्माके साथ जीवात्माकी एकताका प्रतिपादन करते हुए श्रुतिने कहा है कि 'तद् योऽहं सोऽसौ योऽसौ सोऽहम्।' अर्थात् 'जो मैं हूँ सो वह है और जो वह है सो मैं हूँ' (ऐ० आ० २।४।३) तथा 'त्वं वाहमस्मि भगवो देवतेऽहं वै त्वमसि' (वराहोपनिषद् २। ३४) अर्थात् 'हे भगवन् ! हे देव ! निश्चय ही 'तुम' मैं हूँ और 'मैं' तुम हो।' इस प्रकार व्यतिहारपूर्वक अर्थात् एकमें दूसरेके धर्मोंका विनिमय करते हुए एकताका प्रतिपादन किया गया है। ऐसा वर्णन उन्हीं स्थलोंपर किया जाता है, जहाँ इतर वस्तुकी भाँति वास्तवमें भेद होते हुए भी प्रकारान्तरसे अभेद बतलाना अभीष्ट हो। जैसा कि दूसरी जगह श्रुतिमें देखा जाता है- 'अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः।' (छा० उ० १।५।१) अर्थात् 'निश्चय ही जो उद्गीथ है, वह प्रणव है और जो प्रणव है, वह उद्गीथ है।' उद्गीथ और प्रणवमें भेद होते हुए भी यहाँ उपासनाके लिये श्रुतिने व्यतिहारवाक्यद्वारा