वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 351 of 486
Read in context३४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ दोनोंकी एकताका प्रतिपादन किया है। इसी प्रकार यहाँ भी उपासनाके लिये परमात्माके साथ जीवात्माकी एकता बतायी गयी है, ऐसा समझना चाहिये। जहाँ उपाधिकृत भेद होता है, वहाँ ऐसा कथन संगत नहीं होता। यहाँ इस एकताके प्रतिपादनका प्रयोजन यही जान पड़ता है कि उपासक यदि उपासना- कालमें अपनेको परमात्माकी भाँति देह और उसके व्यवहारसे सर्वथा असंग तथा नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त समझकर तद्रूप हो ध्यान करे तो वह शीघ्र ही सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। सम्बन्ध—पुनः प्रकारान्तरसे औपाधिक भेदकी मान्यताका निराकरण करते हैं— सैव हि सत्यादयः ॥ ३।३।३८॥ सा एव=(परमात्मा और जीवका औपाधिक भेद तथा वास्तवमें अत्यन्त अभेद माननेपर) वही अनुपपत्ति है; हि=क्योंकि; सत्यादयः=(परमात्माके) सत्यसंकल्पत्व आदि धर्म (जीवात्माके नहीं माने जा सकते)। व्याख्या—जैसे पूर्वसूत्रमें यह अनुपपत्ति दिखा आये हैं कि जीवात्मा और परमात्मामें अत्यन्त अभेद होनेपर श्रुतिके व्यतिहार-वाक्यद्वारा दोनोंकी एकताका स्थापन संगत नहीं हो सकता, वैसे ही अनुपपत्ति इस सूत्रमें भी प्रकारान्तरसे दिखायी जाती है। कहना यह है कि परमात्माके स्वरूपका जहाँ वर्णन किया गया है, वहाँ उसे सत्यकाम, सत्यसंकल्प, अपहतपाप्मा, अजर, अमर, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सबका परम कारण तथा सर्वाधार बताया गया है। ये सत्यकामत्व आदि धर्म जीवात्माके धर्मोंसे सर्वथा विलक्षण हैं। जीवात्मामें इनका पूर्णरूपसे होना सम्भव नहीं है। जब दोनोंमें धर्मकी समानता नहीं है, तब उनका अत्यन्त अभेद कैसे सिद्ध हो सकता है। इसलिये परमात्मा और जीवात्माका भेद उपाधिकृत है—यह मान्यता असंगत है। सम्बन्ध—यदि कहा जाय कि 'परब्रह्म परमेश्वरमें जो सत्यकामत्व आदि धर्म श्रुतिद्वारा बताये गये हैं, वे स्वाभाविक नहीं, किंतु उपाधिके सम्बन्धसे हैं, वास्तवमें ब्रह्मका स्वरूप तो निर्विशेष है। अतः इन धर्मोंको