वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र ४६-४७ ] अध्याय ३ ३५५ अग्निहोत्र-क्रियासम्बन्धी सब रहस्य नचिकेताको समझा दिया (१। १ । १५)। फिर उस अग्निहोत्ररूप कर्मकी स्तुति करते हुए यमराजने कहा है कि 'इस अग्निहोत्रका तीन बार अनुष्ठान करनेवाला जन्म-मृत्युसे तर जाता है और अत्यन्त शान्तिको प्राप्त हो जाता है।' इत्यादि (१। १। १७-१८)। इस प्रकरणको देखते हुए इस अग्निहोत्ररूप कर्मको मुक्तिका कारण माननेमें कोई आपत्ति मालूम नहीं होती। जिस प्रकार इसके पीछे कही हुई ब्रह्मविद्या मुक्तिमें हेतु है, वैसे ही उसके पहले कहा हुआ यह अग्निहोत्ररूप कर्म भी मुक्तिमें हेतु माना जा सकता है। सम्बन्ध— उसी बातको दृढ़ करते हैं— अतिदेशाच्च ॥ ३ । ३ । ४६ ॥ अतिदेशात्=अतिदेशसे अर्थात् विद्याके समान कर्मोंको मुक्तिमें हेतु बताया जानेके कारण; च=भी (ऊपर कही हुई बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—केवल प्रकरणके बलपर ही कर्म मुक्तिमें हेतु सिद्ध होता है, ऐसी बात नहीं है। श्रुतिने विद्याके समान ही कर्मका भी फल बताया है। यथा—'त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू।' (क० उ० १। १। १७) अर्थात् 'यज्ञ, दान और तपरूप तीन कर्मोंको करनेवाला मनुष्य जन्म-मृत्युसे तर जाता है।' इससे भी कर्मोंका मुक्तिमें हेतु होना सिद्ध होता है। सम्बन्ध— पहले दो सूत्रोंमें उठाये हुए पूर्वपक्षका सूत्रकार उत्तर देते हैं— विद्यैव तु निर्धारणात् ॥ ३ । ३ । ४७॥ तु=किंतु; निर्धारणात्=श्रुतियोंद्वारा निश्चितरूपसे कह दिया जानेके कारण; विद्या एव=केवलमात्र ब्रह्मविद्या ही मुक्तिमें कारण है (कर्म नहीं)। व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि 'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥' अर्थात् 'उस परब्रह्म परमात्माको जानकर ही मनुष्य जन्म-मरणको लाँघ जाता है। परमपद (मोक्ष)-की प्राप्तिके लिये दूसरा कोई मार्ग (उपाय) नहीं है' (श्वेता० उ० ३।८)। इस प्रकार यहाँ