वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextनिश्चितरूपसे एकमात्र ब्रह्मज्ञानको ही मुक्तिका कारण बताया गया है; इसलिये ब्रह्मविद्या ही मुक्तिका हेतु है कर्म नहीं। ब्रह्मविद्याका उपदेश देते समय नचिकेतासे स्वयं यमराजने ही कहा है कि— एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥ 'जो सब प्राणियोंका अन्तर्यामी, एक, अद्वितीय तथा सबको अपने वशमें रखनेवाला है, जो अपने एक ही रूपको बहुत प्रकारसे बना लेता है, उस अपने ही हृदयमें स्थित परमेश्वरको जो ज्ञानी देखते हैं, उन्हींको सदा रहनेवाला आनन्द प्राप्त होता है, दूसरोंको नहीं।' (क० उ० २।२। १२)। अतः पहले अग्निविद्याके प्रकरणमें जो जन्म-मृत्युसे छूटना और अत्यन्त शान्तिकी प्राप्तिरूप फल बताया है, वह कथन स्वर्गलोककी स्तुति करनेके लिये गौणरूपसे है, ऐसा समझना चाहिये। सम्बन्ध—उसी बातको दृढ़ करते हैं— दर्शनाच्च ॥ ३ । ३ । ४८ ॥ दर्शनात् = श्रुतिमें जगह-जगह वैसा वर्णन देखा जानेसे; च = भी (यही दृढ़ होता है)। व्याख्या—श्रुतिमें यज्ञादि कर्मोंका फल स्वर्गलोकमें जाकर वापस आना (मु० उ० १।२।९, १०) और ब्रह्मज्ञानका फल जन्म-मरणसे छूटकर परमात्माको प्राप्त हो जाना (मु० उ० ३।२।५, ६) बताया गया है, इससे भी यही सिद्ध होता है कि एकमात्र ब्रह्मविद्या ही मुक्तिमें हेतु है, यज्ञादि कर्म नहीं। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पूर्वपक्षका उत्तर देते हुए इस प्रकरणको समाप्त करते हैं— श्रुत्यादिबलीयस्त्वाच्च न बाधः ॥ ३।३।४९॥ श्रुत्यादिबलीयस्वात् = प्रकरणकी अपेक्षा श्रुतिप्रमाण और लक्षण आदि