वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र १८ ] अध्याय १ ८९ व्याख्या—श्रुतिमें 'दहराकाश' नाम आया है। आकाश शब्द परमात्माके अर्थमें प्रसिद्ध है। यथा—'को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।' (तै० उ० २।७।१) अर्थात् 'यदि यह आनन्दस्वरूप आकाश (सबको अवकाश देनेवाला परमात्मा) न होता तो कौन जीवित रह सकता ? कौन प्राणोंकी क्रिया कर सकता?' तथा—'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते।' (छा० उ० १। ९। १) अर्थात् 'निश्चय ही ये सब प्राणी आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं।' इसलिये भी 'दहर' शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है। सम्बन्ध—अब 'दहर' शब्दसे जीवात्माका ग्रहण क्यों न किया जाय— यह शंका उठाकर समाधान करते हैं— इतरपरामर्शात् स इति चेन्नासम्भवात्॥ १। ३। १८॥ चेत्=यदि कहो; इतरपरामर्शात्=दूसरे अर्थात् जीवात्माका संकेत होनेके कारण; सः=वही 'दहर' नामसे कहा गया है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; असम्भवात्=क्योंकि वहाँ कहे हुए लक्षण जीवात्मामें सम्भव नहीं हैं। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (८। १। ५)-में इस प्रकार वर्णन आया है—'स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति॥' अर्थात् '(शिष्योंके पूछनेपर) आचार्यने इस प्रकार कहा कि 'इस (देह)- की जरावस्थासे यह जीर्ण नहीं होता, इसके वधसे इसका नाश नहीं होता। यह ब्रह्मपुर सत्य है। इसमें सम्पूर्ण काम-विषय सम्यक् प्रकारसे स्थित है। यह आत्मा पुण्य-पापसे रहित, जरा-मृत्युसे शून्य, शोकहीन, भूख-प्याससे रहित, सत्यकाम तथा सत्यसंकल्प है। जैसे इस लोकमें प्रजा यदि राजाकी आज्ञाका अनुसरण करती है तो वह जिस-जिस वस्तुकी कामना तथा जिस-जिस जनपद