वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context९० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ एवं क्षेत्रभागकी अभिलाषा करती है, उसी-उसीको पाकर सुखपूर्वक जीवन धारण करती है।' इस मन्त्रके अनुसार 'देहकी जरावस्थासे यह जीर्ण नहीं होता और इसके वधसे इसका नाश नहीं होता'—इस कथनसे जीवात्माको लक्ष्य करानेवाला संकेत मिलता है; क्योंकि इसके आगेवाले मन्त्रमें कर्मफलकी अनित्यता बतायी गयी है और कर्मफल-भोगका सम्बन्ध जीवात्मासे ही है। इस प्रकार जीवात्माको लक्ष्य करानेवाला संकेत होनेके कारण वहाँ 'दहर' नामसे 'जीवात्मा' का ही प्रतिपादन है, ऐसा कहा जाय तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि पूर्वोक्त मन्त्रमें ही जो 'सत्यसंकल्प' आदि लक्षण बताये गये हैं, उनका जीवात्मामें होना सम्भव नहीं है। इसलिये यहाँ 'दहर' शब्दसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन हुआ है, ऐसा मानना सर्वथा उचित है। सम्बन्ध—पूर्वोक्त मतकी ही पुष्टिके लिये पुनः शंका उठाकर उसका समाधान करते हैं— उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ॥ १ । ३ । १९ ॥ चेत्=यदि कहो; उत्तरात्=उसके बादवाले वर्णनसे भी 'दहर' शब्द जीवात्माका ही बोधक सिद्ध होता है; तु=तो यह कथन ठीक नहीं है, (क्योंकि) आविर्भूतस्वरूपः=उस मन्त्रमें जिसका वर्णन है, वह अपने शुद्धस्वरूपको प्राप्त हुआ आत्मा है। व्याख्या—''छान्दोग्योपनिषद् (८।३।४)-में कहा है कि 'अथ य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यम् ॥' अर्थात् 'यह जो सम्प्रसाद है, वह इस शरीरसे निकलकर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने शुद्धस्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है। यह आत्मा है, यह अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है—ऐसा आचार्यने कहा। उस इस ब्रह्मका नाम सत्य है।' इस मन्त्रमें 'सम्प्रसाद' के नामसे स्पष्ट ही जीवात्माका वर्णन है और उसके लिये भी वे ही अमृत, अभय आदि विशेषण दिये गये हैं,