वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 94 of 486
Read in contextसूत्र २०-२१ ] अध्याय १ ९१ जो अन्यत्र ब्रह्मके लिये आते हैं, इसलिये इन लक्षणोंका जीवात्मामें होना असम्भव नहीं है, अतएव 'दहर' शब्दको 'जीवात्मा' का वाचक माननेमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये।'' ऐसी शंका उठायी जाय तो ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त मन्त्रमें अपने शुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुए जीवात्माके लिये वैसे विशेषण आये हैं। इसलिये उसके आधारपर 'दहर' शब्दको जीवात्माका वाचक नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध— यदि ऐसी बात है, तो उक्त प्रकरणमें जीवात्माको लक्ष्य करानेवाले शब्दोंका प्रयोग क्यों किया गया है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— अन्यार्थश्च परामर्शः॥ १। ३। २०॥ परामर्शः= (उक्त प्रकरणमें) जीवात्माको लक्ष्य करानेवाला संकेत, च=भी; अन्यार्थः=दूसरे ही प्रयोजनके लिये है। व्याख्या— पूर्वोक्त प्रकरणमें जो जीवात्माको लक्ष्य करानेवाले शब्दोंका प्रयोग हुआ है, वह 'दहर' शब्दसे जीवात्माका ग्रहण करानेके लिये नहीं, अपितु दूसरे ही प्रयोजनसे है। अर्थात् उस दहर शब्दवाच्य परमात्माके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर जीवात्मा भी वैसे ही गुणोंवाला बन जाता है, यह भाव प्रदर्शित करनेके लिये ही वहाँ जीवात्माका उस रूपमें वर्णन है। परब्रह्मका ज्ञान हो जानेपर बहुत- से दिव्य गुण जीवात्मामें आ जाते हैं, यह बात भगवद्गीतामें भी कही गयी है (१४।२)। इसलिये उक्त प्रकरणमें जीवात्माका वर्णन आ जानेमात्रसे यह नहीं सिद्ध होता कि वहाँ 'दहर' शब्द जीवात्माका वाचक है। सम्बन्ध—इसी बातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार पुनः शंका उठाकर उसका समाधान करते हैं— अल्पश्रुतेरिति चेत्तदुक्तम् ॥ १। ३। २१ ॥ चेत्=यदि कहो; अल्पश्रुतेः = श्रुतिमें 'दहर' को बहुत छोटा बताया गया