वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र २३-२४ ] अध्याय १ ९३ सम्बन्ध—इस विषयमें स्मृतिका भी प्रमाण देते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ १ । ३ । २३ ॥ च = इसके सिवा; स्मर्यते अपि = यही बात स्मृतिमें भी कही गयी है। व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वर सबके हृदयमें स्थित है और वह छोटेसे भी छोटा है—ऐसा वर्णन स्मृतियोंमें इस प्रकार आया है— 'सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः।' (गीता १५।१५)। 'हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।' (गीता १३।१७)। 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।' (गीता १८।६१)। 'अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।' (गीता १३।१६) 'अणोरणीयांसम्।' (गीता ८।९) इत्यादि। ऐसा वर्णन होनेके कारण उस सर्वव्यापी परब्रह्म परमेश्वरको स्थानकी अपेक्षासे छोटे आकारवाला कहना उचित ही है। अतः 'दहर' शब्दसे परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, जीवात्माका नहीं। सम्बन्ध—उपर्युक्त विवेचन पढ़कर यह जिज्ञासा होती है कि कठोपनिषद् (२। १। १२, १३ तथा २। ३। १७)-में जिसे अंगुष्ठके बराबर बताया गया है, वह जीवात्मा है या परमात्मा ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— शब्दादेव प्रमितः ॥ १ । ३ । २४॥ शब्दात् = (उक्त प्रकरणमें आये हुए) शब्दसे; एव = ही; (यह सिद्ध होता है कि) प्रमितः = अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला पुरुष (परमात्मा ही है)। व्याख्या—कठोपनिषद्में कहा है कि 'अंगुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति।' (२।१।१२) तथा 'अंगुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः' 'ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः।' (२।१।१३) अर्थात् 'अंगुष्ठके बराबर मापवाला परम पुरुष शरीरके मध्यभाग (हृदय)-में स्थित है।' तथा 'अंगुष्ठके बराबर मापवाला परम पुरुष धूमरहित ज्योतिकी भाँति एकरस है, वह भूत, वर्तमान और भविष्यपर शासन करनेवाला है। वह आज भी