वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 97 of 486
Read in context९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ है और कल भी रहेगा; अर्थात् वह नित्य सनातन है।' इस प्रकरणमें जिसे अंगुष्ठके बराबर मापवाला पुरुष बताया गया है, वह परब्रह्म परमात्मा ही है; यह बात उन्हीं मन्त्रोंमें कहे हुए शब्दोंसे सिद्ध होती है; क्योंकि वहाँ उस पुरुषको भूत, वर्तमान और भविष्यमें होनेवाली समस्त प्रजाका शासक, धूमरहित अग्निके सदृश एकरस और सदा रहनेवाला बताया गया है तथा आगे चलकर उसीको विशुद्ध अमृतस्वरूप जाननेके लिये कहा गया है (२। ३। १७)। सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि उस परब्रह्म परमात्माको अंगुष्ठके बराबर मापवाला क्यों बताया गया है? इसपर कहते हैं— हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॥ १ । ३ । २५ ॥ तु=उस परमपुरुषको अंगुष्ठके बराबर मापवाला कहना तो; हृदि=हृदयमें स्थित बताये जानेकी; अपेक्षया=अपेक्षासे है; मनुष्याधिकारत्वात्=क्योंकि (ब्रह्मविद्यामें) मनुष्यका ही अधिकार है। व्याख्या—उपनिषदोंमें वर्णित ब्रह्मविद्याके द्वारा ब्रह्मको जाननेका अधिकार मनुष्यको ही है। अन्य पशु-पक्षी आदि अधम योनियोंमें यह जीवात्मा उस परब्रह्म परमात्माको नहीं जान सकता और मनुष्यके हृदयका माप अंगुष्ठके बराबर माना गया है; इस कारण यहाँ मनुष्य-हृदयके मापकी अपेक्षासे उस परब्रह्म परमेश्वरको ‘अंगुष्ठमात्र पुरुष' कहा गया है। सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें अधिकारीकी बात आ जानेसे प्रसंगवश दूसरा प्रकरण चल पड़ा। पहले यह बताया गया है कि वेदाध्ययनपूर्वक ब्रह्मविद्याके द्वारा ब्रह्मको प्राप्त करनेका अधिकार मनुष्योंका ही है। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि क्या मनुष्यको छोड़कर अन्य किसीका भी अधिकार नहीं है? इसपर कहते हैं— तदुपर्यपि बादरायणः सम्भवात् ॥ १ । ३ । २६ ॥ बादरायणः=आचार्य बादरायण कहते हैं कि; तदुपरि=मनुष्यसे ऊपर जो