ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र २४-२५ ] अध्याय ३ २७१ तक उसीसे समस्त प्राण, इन्द्रिय, पञ्चभूत, सूर्य, चन्द्रमा, वेद, अग्नि, देवता, मनुष्य, अन्न, समुद्र तथा पर्वत आदिकी सृष्टि बतायी गयी है । तदनन्तर २ । १ । १० वें मन्त्रमे उस पुरुषकी महिमाका इस प्रकार वर्णन किया गया है—'पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् । एतद् यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थि विकिरतीह सोम्य ।' अर्थात् 'पुरुष ही यह सब कुछ है, वही तप, कर्म और परम अमृतरूप ब्रह्म है । हे सोम्य ! हृदयरूप गुफामे स्थित इस अन्तर्यामी परम पुरुषको जो जानता है, वह यहीं इस मनुष्य- शरीरमे ही अविद्याजनित गाँठको छिन्न-भिन्न कर देता है ।' इस प्रकार इस पुरुषविद्याके प्रकरणमे जो पुरुषके सर्वोत्पादकत्व, परात्परत्व, सर्वव्यापकत्व तथा अविद्यानिवारकत्व आदि दिव्य गुण बताये गये है, उनका भी नेत्रान्तर्वर्ती और सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषोमे तथा जहाँ-जहाँ स्थूल, सूक्ष्म या कारणशरीरका वर्णन पुरुषके नामसे किया गया है, उन पुरुषोमे ( छा० उ० ५ । ९ । १ ) ( तै० उ० २ । १ से ७तक ) अध्याहार नहीं किया जा सकता; क्योकि श्रुतिमे कहीं भी उनके लिये वैसे गुणोंका प्रतिपादन नहीं किया गया है । उन प्रकरणोमे उन पुरुषोंके अन्तरात्मा परमपुरुषको लक्ष्य करानेके लिये उनको पुरुष नाम दिया गया है । सम्बन्ध—इसी प्रकार— वेधाद्यर्थभेदात् ॥ ३ । ३ । २५ ॥ वेधादि=बींधने आदिका वर्णन करके जो ब्रह्मको वेधका लक्ष्य बताया गया है, इन सबका अध्याहार भी अन्य विद्याओमे नहीं करना चाहिये, अर्थभेदात्= क्योंकि वहाँ प्रयोजनमे भेद है । व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् ( २ । २ । ३ ) मे कहा है कि— धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शर ह्युपासानिशितं सन्धयीत । आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ 'हे सोम्य ! उपनिषद्मे वर्णित प्रणवरूप महान् धनुषको लेकर उसपर उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण चढ़ाना चाहिये । फिर भावपूर्ण चित्तके द्वारा उस बाणको खींचकर तुम परम अक्षर परमेश्वरको ही लक्ष्य बनाकर उसे बींधो ।' इस वर्णनके पश्चात् दूसरे मन्त्रमे आत्माको ही बाणका रूप दिया गया है । इस