ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context२७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ प्रकार यहाँ जो ब्रह्मको आत्मरूप बाणके द्वारा बींधनेयोग्य बताया गया है; उसके इस वेध्यत्व आदि गुणोंका तथा ॐकारके धनुर्भाव और आत्माके बाणत्वका भी जहाँ ओंकारके द्वारा परमात्माकी उपासना करनेका प्रकरण है, उन ब्रह्मविद्याओमे उपसंहार नहीं करना चाहिये; क्योकि यहाँ चिन्तनमें तन्मयताका स्वरूप बतानेके लिये वैसा रूपक लिया गया है । इस तरह रूपककी कल्पनाद्वारा जो विशेष बात कही जाय, वे अन्य प्रकरणमे अनुपयुक्त होनेके कारण लेने योग्य नहीं हैं। सम्बन्ध—बीसवें सूत्रसे पचीसवें सूत्रतक भिन्न-भिन्न श्रुतियोंपर यह विचार किया गया कि उनमें कौन-कौन-सी बातें एक जगहसे दूसरी जगह अध्याहार करने योग्य नहीं हैं। अब परमगति अर्थात् परमधाम और परमात्माकी प्राप्तिविषयक श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है । श्रुतियोंमें ब्रह्म- विद्याका फल कहीं तो केवल दुःख, शोक, बन्धन और शुभाशुभ कर्मोंकी निवृत्तिमात्र बतलाया है; कहीं उसके पश्चात् परम समता, परमधाम और परब्रह्म परमात्मा- की प्राप्तिका भी वर्णन है। अतः ब्रह्मविद्याके फलमें भेद है या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात्कुशाच्छन्दस्तुत्युप- गानवत्तदुक्तम् ॥ ३ । ३ । २६ ॥ हानौ=जहाँ केवल दुःख, शोक, पुण्य, पाप आदिके नाशका ही वर्णन है ऐसी श्रुतिमें; तु=भी; उपायनशब्दशेषत्वात्=लाभरूप परमधामकी प्राप्ति आदि फलका भी अध्याहार कर लेना चाहिये, क्योंकि वह वाक्यका शेष भाग है; कुशाच्छन्दस्तुत्युपगानवत्=यह बात कुशा, छन्द, स्तुति और उपगानकी भाँति समझनी चाहिये; तत् उक्तम्=ऐसा पूर्वमीमांसामें कहा गया है । व्याख्या—उद्दालक आदि छः ऋषियोंको वैश्वानरविद्याका उपदेश देकर राजा अश्वपति कहते है कि जो इस विद्याको जानकर हवन करता है, उसके समस्त पाप उसी तरह भस्म हो जाते हैं, जिस प्रकार सींकका अग्रभाग अग्निमें डालनेसे हो जाता है । ( छा० उ० ५। २४ । ३) इसी प्रकार कठमें परमात्मज्ञानका फल कहीं केवल हर्ष-शोकका नाश (१।२। १२) और कहीं मृत्युमुखसे छूटना बताया , गया है (१।३।१५)। मुण्डकमे कहीं अविद्याका नाश (२।१।१०) और कहीं हृदयकी ग्रन्थि, समस्त संशय तथा कर्मोंका नाश कहा गया है (२।२।८)।