ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र ७-८ ] अध्याय ३ ३०५ व्याख्या-जैमिनिने जो विद्याको कर्मका अङ्ग बताया है, वह ठीक नहीं है। उन्होंने अपने कथनकी सिद्धिके लिये जो युक्तियाँ दी है, वे भी आभासमात्र ही है। अतः बादरायणने पूर्वसूत्रमे जो अपना मत प्रकट किया है, वह अब भी ज्यों-का-त्यों है। जैमिनिकी युक्तियोंसे उसमे कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यद्यपि ब्रह्मज्ञानके साथ-साथ लोकसंग्रहके लिये या प्रारब्धानुसार शरीरस्थितिके निमित्त किये जानेवाले कर्म रहें, तो उनसे कोई हानि नहीं है; तथापि परमात्माकी प्राप्तिरूप पुरुषार्थका कारण तो एकमात्र परमात्माका तत्त्वज्ञान ही है। इसके सिवा, न तो कर्म-ज्ञानका समुच्चय परमपुरुषार्थका साधन है और न केवल कर्म ही; क्योकि श्रुतिमे कहा है- इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ 'इष्ट और पूर्त कर्मोंको ही श्रेष्ठ माननेवाले मूर्खलोग उससे भिन्न वास्तविक श्रेयको नहीं जानते। वे शुभ कर्मोंके फलरूप स्वर्गलोकके उच्चतम स्थानमे वहाँके भोगोका अनुभव करके इस मनुष्यलोकमें या इससे भी अत्यन्त नीचेके लोकमे गिरते हैं।' (मु० उ० १ । २ । १०) परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ 'इस प्रकार कर्मसे प्राप्त होनेवाले लोकोंकी परीक्षा करके अर्थात् उनकी अनित्यताको समझकर द्विजको उनसे सर्वथा विरक्त हो जाना चाहिये तथा यह निश्चय करना चाहिये कि वह अमृत अर्थात् स्वतःसिद्ध परमात्मा कर्मोंके द्वारा नहीं मिल सकता। अतः जिज्ञासु पुरुष उस ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये वेदज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ गुरुके समीप हाथमें समिधा लिये हुए जाय ।' (मु० उ० १ । २ । १२) 'इस तरह अपनी शरणमे आये हुए शिष्यको ब्रह्मज्ञानी महात्मा ब्रह्मविद्याका उपदेश करे ।' (मु० उ० १ । २ । १३) । यह सब कहकर श्रुतिने वहाँ ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन किया है और उसे ज्ञानके द्वारा प्राप्त होने योग्य बतलाकर (मु० उ० २ । २ । ७) कहा है कि 'कार्य-कारणस्वरूप उस ब्रह्मको जान लेनेपर इस मनुष्यके हृदयकी चिज्जड-ग्रन्थिका भेदन हो जाता है, सब संशय नष्ट हो जाते हैं और समस्त कर्मोंका क्षय हो जाता है।' (मु० उ० २ । २ । ८) । इस प्रकार श्रुतियोमे जगह-जगह कर्मोंकी अपेक्षा ब्रह्मज्ञानका महत्त्व बहुत अधिक बताया गया है। इसलिये ब्रह्मविद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है। वे० द० २०-