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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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३०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध-श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार देखनेसे जो विद्याको कर्मका अङ्ग बताया गया था, उसका उत्तर देते हैं— तुल्यं तु दर्शनम् ॥ ३ । ४ । ९ ॥ दर्शनम् = आचारका दर्शन; तु = तो; तुल्यम् = समान है (अतः उससे विद्या कर्मका अङ्ग है, यह नहीं सिद्ध होता)। व्याख्या-आचारसे भी यह सिद्ध नहीं होता कि विद्या कर्मका अङ्ग है; क्योंकि श्रुतिमें दोनों प्रकारका आचार देखा जाता है। एक ओर ज्ञाननिष्ठ जनकादि गृहस्थ महापुरुष लोकसंग्रहके लिये यज्ञ-यागादि कर्म करते देखे जाते हैं तो दूसरी ओर केवल भिक्षासे निर्वाह करनेवाले विरक्त संन्यासी महात्मा लोकसंग्रहके लिये ही समस्त कर्मोंका त्याग करके ज्ञाननिष्ठ हो केवल ब्रह्मचिन्तनमे रत रहते हैं। इस प्रकार आचार तो दोनों ही तरहके उपलब्ध होते हैं। इससे कर्मकी प्रधानता नहीं सिद्ध होती है। जिनको वास्तवमे ज्ञान प्राप्त हो गया है, उनको न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन है और न उसके त्यागसे ही (गीता ३ । १७)। अतएव प्रारब्ध तथा ईश्वरके विधानानुसार उनका आचरण दोनों प्रकारका ही होता है। इसके सिवा श्रुतिमे यह भी कहा है कि 'इसलिये पूर्वके विद्वानोंने अग्निहोत्रादि कर्मोंका अनुष्ठान नहीं किया' (कौ० उ० २ । ५) 'इस आत्माको जानकर ही ब्राह्मणलोग पुत्रादिकी इच्छाका त्याग करके विरक्त हो भिक्षासे निर्वाह करते हुए विचरते हैं' (बृह०उ० ३।५।१)। याज्ञवल्क्यने भी दूसरोंमे वैराग्यकी भावना उत्पन्न करनेके लिये अन्तमें संन्यास ग्रहण किया (बृह०उ० ४ । ५ । १५)। इस प्रकार श्रुतियोमे कर्म-त्यागके आचारका भी जगह-जगह वर्णन पाया जाता है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि परमपुरुषार्थका हेतु केवल ब्रह्मज्ञान ही है और वह कर्मका अङ्ग नहीं है। सम्बन्ध-पूर्वपक्षकी ओरसे जो श्रुतिका प्रमाण दिया गया था, उसका उत्तर देते हैं— असार्वत्रिकी ॥ ३ । ४ । १० ॥ असार्वत्रिकी=(वह श्रुति) एकदेशीय है—सर्वत्र सम्बन्ध रखनेवाली नहीं है।