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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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३२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः उपासनाविषयक कर्मानुष्ठानकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं— अन्तरा चापि तु तद्दृष्टेः ॥ ३ । ४ । ३६ ॥ तु = इसके सिवा; अन्तरा = आश्रमधर्मोंके अभावमे; च अपि = भी ( केवल उपासनाविषयक अनुष्ठानसे परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है ); तद्दृष्टेः = क्योंकि श्रुतिमें ऐसा विधान देखा जाता है । व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद् ( १ । १४ ) मे कहा है— स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत् ॥ 'अपने शरीरको नीचेकी अरणि और प्रणवको ऊपरकी अरणि बनाकर ध्यानके द्वारा निरन्तर मन्थन करते रहनेसे साधक छिपी हुई अग्निकी भाँति हृदयमें स्थित परमदेव परमेश्वरको देखे ।' इस कथनके पश्चात् उपर्युक्तरूपसे परमेश्वरमे ध्यानकी स्थितिके लिये प्रार्थना करने तथा उन्हीं परमात्माकी शरण ग्रहण करनेका भी वर्णन है ( श्वेता० उ० २ । १ से ५ ) । तदनन्तर यह कहा गया है कि 'हे साधक ! सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक सर्वान्तर्यामी परमेश्वरकी प्रेरणासे तुम्हें उस परब्रह्म परमात्माकी सेवा-समाराधना करनी चाहिये । उन परमेश्वरकी ही शरण लेकर उन्हींमे अपने- आपको विलीन कर देना चाहिये । ऐसा करनेसे तुम्हारे पूर्वकृत समस्त सञ्चित कर्म साधनमे विघ्नकारक नहीं होगे ।' ( श्वेता० उ० २ । ७)। इसके बाद इसका फल आत्मा और परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार बताया है ( २ । १४, १५ ) । इसी तरह अन्य श्रुतियोंमें भी केवल उपासनासे ही परमात्माकी प्राप्ति बतायी है। ( श्वेता० उ० ४ । १७ तथा ६ । २३ ) । इससे यह सिद्ध होता है कि जो अन्य वर्णाश्रमधर्मोंका पालन करनेमें असमर्थ हैं, उनको केवल उपासनाके धर्मोंका पालन करनेसे ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है । सम्बन्ध—इसी बातके समर्थनमें स्मृतिका प्रमाण देते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ ३ । ४ । ३७ ॥ अपि च = इसके सिवा; स्मर्यते = स्मृतियोंमें भी यही बात कही गयी है ।