ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र ३६--३८ ] अध्याय ३ ३२५ व्याख्या-गीता आदि स्मृतियोमे जो वर्णाश्रमोचित कर्मके अधिकारी नहीं है, ऐसे पापयोनि चाण्डाल आदिको भी भगवान्की शरणागतिसे परमगतिकी प्राप्ति बतलायी गयी है (गीता ९ । ३२)। वहाँ भगवान्ने यह भी स्पष्ट कहा है कि 'मेरी प्राप्तिमें वेदाध्ययन, यज्ञानुष्ठान, दान तथा नाना प्रकारकी क्रिया और उग्र तप हेतु नहीं है, केवलमात्र अनन्यभक्तिसे ही मै जाना, देखा और प्राप्त किया जा सकता हूँ' ( ११ । ४८, ५३, ५४ )। इसी प्रकार श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थोंमें भी जगह-जगह इस बातका समर्थन किया गया है कि वर्ण और आश्रमकी मर्यादासे रहित मनुष्य केवल भक्तिसे पवित्र होकर परमात्माको प्राप्त कर लेता है। यथा- किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा आभीरकङ्का यवनाः खसादयः। येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः शुद्ध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥ 'किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कङ्क, यवन, खस आदि तथा अन्य जितने भी पापयोनिके मनुष्य हैं, वे सब जिनकी शरण लेनेसे शुद्ध हो परमात्माको प्राप्त हो जाते है, उन सर्वसमर्थ भगवान्को नमस्कार है।' (श्रीमद्भा० २ । ४ । १८)। इन सब वचनोसे भी यह सिद्ध होता है कि उपासना-सम्बन्धी धर्मोका अनुष्ठान ही परम आवश्यक है। सम्बन्ध-अब भागवतधर्मानुष्ठानका विशेष माहात्म्य सिद्ध करते है- विशेषानुग्रहश्च ॥ ३ । ४ । ३८ ॥ च=इसके सिवा, विशेषानुग्रहः = भगवान्की भक्तिसम्बन्धी धर्मोंका पालन करनेसे भगवान्का विशेष अनुग्रह होता है। व्याख्या-ऊपर बतलायी हुई अन्य सब बाते तो भागवतधर्मकी विशेषतामे हेतु है ही। उनके सिवा, यह एक विशेष बात है कि अन्य किसी प्रकारके धर्म- कर्म आदिका आश्रय न लेकर जो अनन्य-भावसे केवल भगवान्की भक्तिका अनुष्ठान करता है,* उसको भगवान्की विशेष कृपा प्राप्त होती है। गीतामे भगवान्ने
- भक्तिका वर्णन श्रीमद्भागवतमे इस प्रकार आया है- श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ (७।५।२३) 'भगवान् विष्णुका श्रवण, कीर्तन, स्मरण, चरणसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन-ये भगवद्भक्तिके नौ भेद हैं।' (इन्हींको नवधा भक्ति कहते हैं।)