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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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सूत्र ३९—४० ] अध्याय ३ ३२७ अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम् । तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥ 'अहो आश्चर्य है कि जिसकी जिह्वापर तुम्हारा पवित्र नाम रहता है, वह चाण्डाल भी श्रेष्ठ है, क्योंकि जो तुम्हारे नामका कीर्तन करते हैं, उन श्रेष्ठ पुरुषोने तप, यज्ञ, तीर्थस्नान और वेदाध्ययन आदि सब 'कुछ कर लिये।' ( श्रीमद्भा० ३ । ३३ । ७ ) इसी प्रकार जगह-जगह भगवान्‌के भक्तोंके लक्षण बतलाते हुए वर्ण-आश्रम आदिके धर्मका पालन करनेवालोकी अपेक्षा उनकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन किया गया है। सम्बन्ध—इस प्रकार उपासना-विषयक श्रवण, कीर्तन आदि विशेष धर्मोंका महत्त्व दिखलाया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि यदि कोई मनुष्य किसी कारणवश आश्रमका व्यतिक्रम करना चाहे तो कर सकता है या नहीं ? यदि कर ले तो उसका व्यक्तित्व कैसा माना जाना चाहिये ? इत्यादि। अतः इस विषय- का निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— तद्भूतस्य तु नातद्भावो जैमिनेरपि नियमातद्रूपाभावेभ्यः।३।४।४०। तद्भूतस्य = उच्च आश्रममे स्थित मनुष्यका; तु = तो; अतद्भावः = उसे छोड़कर पूर्व आश्रममें लौट आना; न = नहीं बन सकता; नियमातद्रूपाभावेभ्यः = क्योंकि शास्त्रोंमे पीछे न लौटनेका ही नियम है, श्रुतिमे आश्रम बदलनेका जो क्रम कहा गया है, उससे यह विपरीत है और इस प्रकारका शिष्टाचार भी नहीं है; जैमिनेः अपि = जैमिनि ऋषिकी भी यही सम्मति है। व्याख्या—जो चतुर्थ आश्रम ग्रहण कर चुके हैं, उनका पुनः गृहस्थाश्रममे लौटना शास्त्रसम्मत नहीं है। इसी प्रकार वानप्रस्थका भी पुन. गृहस्थमे प्रवेश उचित नहीं है, क्योकि ऊँचे आश्रममे जाकर पुनः लौटनेका श्रुति-स्मृतियोमे निषेध है तथा आश्रम बदलनेका जो क्रम श्रुतिमे बताया गया है, वह इस प्रकार है—'ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य गृही भवेत्। गृही भूत्वा वनी भवेत्। वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा।'—'ब्रह्मचर्य- को पूरा करके गृहस्थ होवे, गृहस्थसे वानप्रस्थ हो और वानप्रस्थसे संन्यास ले

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