ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context३२८ वेदान्त-दर्शन [पाद ४ अथवा दूसरे प्रकारसे यानी ब्रह्मचर्यसे या गृहस्थसे अथवा वानप्रस्थसे ही संन्यास ले।' ( जाबाल० उ० ४ ) । अतः पीछे लौटना उस क्रमसे विपरीत है। इसके सिवा, इस प्रकारका शिष्टाचार भी नहीं है। इन सब कारणोंसे जैमिनि ऋषिकी भी यही सम्मति है कि उच्च आश्रमसे पुनः लौटना नहीं हो सकता। इसलिये यही सिद्ध हुआ कि वेद और स्मृतियोमे जो एक आश्रमसे दूसरे आश्रममे प्रवेश करनेकी रीति बतायी गयी है, उसको छोड़कर आश्रमका व्यतिक्रम करना किसी प्रकार भी न्यायसङ्गत नहीं है। अतः जो इस प्रकार आश्रमभ्रष्ट हो चुका है, उसका ब्रह्मविद्यामे अधिकार नहीं है। सम्बन्ध—इस प्रकारके मनुष्यको प्रायश्चित्त कर लेनेपर तो अधिकार प्राप्त हो जाता होगा ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— न चाधिकारिकमपि पतनानुमानात्तदयोगात् ॥ ३ । ४ । ४१ ॥ च=इसके सिवा; आधिकारिकम्=प्रायश्चित्तके अधिकारी अन्य आश्रम- वालोके लिये जो प्रायश्चित्त बताया गया है, वह; अपि=भी; न=उसके लिये विहित नहीं है; पतनानुमानात्=क्योकि स्मृतिमे उसका महान् पतन माना गया है; तदयोगात्=इसलिये वह प्रायश्चित्तके उपयुक्त नहीं रहा । व्याख्या—ब्रह्मचर्य-आश्रममे यदि ब्रह्मचारीका व्रत भङ्ग हो जाय तो वेद और स्मृतियोमे उसका प्रायश्चित्त बताया गया है ( मनु० २ । १८१ ) तथा गृहस्थ भी ऋतुकाल आदिका नियमपालन भङ्ग कर दे तो उसका प्रायश्चित्त है; क्योकि वे प्रायश्चित्तके अधिकारी है। परन्तु जिन्होने वानप्रस्थ या संन्यास आश्रम स्वीकार कर लिया, वे यदि पुनः गृहस्थ-आश्रममें लौटकर स्त्रीप्रसङ्गादिमे प्रवृत्त होकर पतित हो गये हैं तो उनके लिये शास्त्रोमें किसी प्रकारके प्रायश्चित्तका विधान नहीं है; क्योकि स्मृतियोमे उनका अतिशय पतन माना गया है। इसलिये वे प्रायश्चित्तके अधिकारी नही रहे। जैमिनि आचार्यकी भी सूत्रकारके मतानुसार यही सम्मति है कि उनके लिये प्रायश्चित्तका विधान नहीं है। सम्बन्ध—इसपर अन्य आचार्योंका मत बताते हैं— उपपूर्वमपि त्वेके भावमशनवत्तदुक्तम् ॥ ३ । ४ । ४२ ॥ एके=कई एक आचार्य; उपपूर्वम्=इसे उपपातक; अपि=भी मानते है,