ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र ४८-५० ] अध्याय ३ ३३३ है। इस सुगमताको दृष्टिमे रखकर वैसा कहा गया है, न कि अन्य आश्रमोंमे ब्रह्मविद्याके अधिकारका निषेध करनेके लिये । सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे पुनः सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार 'सिद्ध किया जाता है— मौनवदितरेषामप्युपदेशात् ॥ ३ । ४ । ४९ ॥ इतरेषाम् = अन्य आश्रमवालोके लिये; अपि = भी; मौनवत् = मननशीलताकी भाँति; उपदेशात् = ( विद्योपयोगी सभी साधनोंका ) उपदेश होनेके कारण ( सभी आश्रमोंमे ब्रह्मविद्याका अधिकार सिद्ध होता है )। व्याख्या—जिस प्रकार पूर्व प्रकरणमे मननशीलता ( मौन ) रूप साधनका सबके लिये विधान बताया गया है, इसी प्रकार श्रुतिमे अन्य आश्रमवालोंके लिये भी विद्योपयोगी सभी साधनोंका उपदेश दिया गया है। जैसे— 'इस प्रकार ब्रह्मवेत्ताकी महिमाको जाननेवाला शान्त ( मनको वशमे करनेवाला मननशील ), दान्त (इन्द्रिय-समुदायको वशमें करनेवाला ), उपरत ( भोगोंसे सम्बन्धरहित ), तितिक्षु ( सुख-दुःखसे विचलित न होनेवाला ) और समाहित ( ध्यानस्थ ) होकर अपने ही भीतर उस सबके आत्मस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करता है।' (बृह० ३ ० ४ । ४ । २३)। ऐसी ही बात दूसरे प्रकरणोंमें भी कही है। इससे यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्याका अधिकार सभी आश्रमोंमें है। सम्बन्ध—सैंतालीसवें सूत्रके प्रकरणमे जो बाल्यभावसे स्थित होनेकी बात कही गयी थी, उसमे बालकके कौन-से भावोंका ग्रहण है, यह स्पष्ट करनेके लिये कहते हैं— अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् ॥ ३ । ४ । ५० ॥ अनाविष्कुर्वन् = अपने गुणोंको प्रकट न करता हुआ बालककी भाँति दम्भ और अभिमानसे रहित होवे; अन्वयात् = क्योकि ऐसे भावोंका ही ब्रह्मविद्यासे सम्बन्ध है। व्याख्या—बालकमें मान, दम्भ तथा राग-द्वेष आदि विकारोंका अभाव है; अतः उसीकी भाँति उन विकारोंसे रहित होना ही यहाँ बाल्य-भाव है। अपवित्र- भक्षण, आचारहीनता, अशौच और स्वेच्छाचारिता आदि निषिद्ध भावोंको ग्रहण करना यहाँ अभीष्ट नहीं है। विद्याके सहकारी साधनरूपसे श्रुतिमे बाल्यभावका