ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
Page 355 of 417
Read in context३३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ उल्लेखं हुआ है। अतः उसके उपयोगी भाव ही लिये जा सकते है, विरोधी भाव नहीं। इससे श्रुतिका यही भाव मालूम होता है कि ब्रह्मविद्याका साधक बालककी भाँति दम्भ, अभिमान तथा राग-द्वेष आदिसे रहित होकर विचरे। सम्बन्ध—यहाँतक यह निश्चय किया गया कि सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार है। अब यह जिज्ञासा होती है कि शास्त्रोंमें जो ब्रह्मविद्याका फल जन्म- मृत्यु आदि दुःखोंसे छूटना और परमात्माको प्राप्त हो जाना बताया गया है, वह इसी जन्ममें प्राप्त हो जाता है या जन्मान्तरमें ? इसपर कहते हैं— ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् ॥ ३ । ४ । ५१ ॥ अप्रस्तुतप्रतिबन्धे=किसी प्रकारका प्रतिबन्ध उपस्थित न होनेपर; ऐहिकम्=इसी जन्ममे वह फल प्राप्त हो सकता है; अपि= ( प्रतिबन्ध होनेपर ) जन्मान्तरमे भी हो सकता है; तद्दर्शनात्=क्योकि यही बात श्रुतियो और स्मृतियोमें देखी जाती है। व्याख्या—श्रुतिमे कहा गया है कि गर्भमे स्थित वामदेव ऋषिको ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो गयी थी । ( ऐ० उ० २ । ५ ) भगवद्गीतामे कहा है कि 'न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ।' 'कल्याणमय कर्म अर्थात् परमात्माकी प्राप्तिके लिये साधन करनेवालेकी कभी दुर्गति नहीं होती।' ( ६ । ४० ) । 'किन्तु वह दूसरे जन्ममे पूर्वजन्म-सम्बन्धी शरीरद्वारा प्राप्त की हुई बुद्धिसे युक्त हो जाता है और पुनः परमात्माकी प्राप्तिके साधनमे लग जाता है ।'* ( गीता ६ । ४३ ) इस प्रकार श्रुतियो और स्मृतियोंके प्रमाणोको देखनेसे यही सिद्ध होता है कि यदि किसी प्रकारका कोई प्रतिबन्ध उपस्थित नहीं होता, तब तो इसी जन्ममे उसको मुक्ति- रूप फलकी प्राप्ति हो जाती है और यदि कोई विघ्न पड़ जाता है तो जन्मान्तरमे वह फल मिलता है । तथापि यह निश्चय है कि किया हुआ अभ्यास व्यर्थ नहीं जाता । सम्बन्ध—उपर्युक्त ब्रह्मविद्याका मुक्तिरूप फल किसी प्रकारका प्रतिबन्ध न रहनेके कारण जिस साधकको इसी जन्ममें मिलता है, उसे यहाँ मृत्युलोकमें ही मिल जाता है या लोकान्तरमें जाकर मिलता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं-- ✲ तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥