ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
सूत्रकारने कहीं भी अपने सूत्रमें सांख्य, जैन, बौद्ध या वैशेषिक मतके आचार्योंका
( ६ ) होनेवाली त्रुटियोंको सूचित करें, जिससे दूसरे संस्करणमें उनके सुधारका प्रयत्न किया जा सके । यहाँ प्रसङ्गवश ब्रह्मसूत्र और उसके प्रतिपाद्य विषयके सम्बन्धमें भी कुछ निवेदन करना आवश्यक प्रतीत होता है । ब्रह्मसूत्र अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ है । कुछ आधुनिक विद्वान् इसमें सांख्य, वैशेषिक, बौद्ध, जैन, पाशुपत और पाञ्चरात्र आदि मतोंकी आलोचना देखकर इसे अर्वाचीन बतानेका साहस करते हैं और बादरायणको वेदव्याससे भिन्न मानते हैं; परंतु उनकी यह धारणा नितान्त भ्रमपूर्ण है । ब्रह्मसूत्रमें जिन मतोंकी आलोचना की गयी है, वे प्रवाहरूपसे अनादि हैं । वैदिककालसे ही सद्वाद और असद्वाद ( आस्तिक और नास्तिकमत ) का विवाद चला आ रहा है । इन प्रवाहरूपसे चले आये हुए विचारोंमेंसे किसी एकको अपनाकर भिन्न-भिन्न दर्शनोंका संकलन हुआ है । सूत्रकारने कहीं भी अपने सूत्रमें सांख्य, जैन, बौद्ध या वैशेषिक मतके आचार्योंका नामोल्लेख नहीं किया है । उन्होंने केवल प्रधानकारणवाद, अणुकारणवाद, विज्ञानवाद आदि सिद्धान्तोंकी ही समीक्षा की है । सूत्रोंमें बादरि औडुलोमि, जैमिनि, आश्मरथ्य, काशकृत्स्न और आत्रेय आदिके नाम आये हैं, जो अत्यन्त प्राचीन हैं; इनमेंसे कितनोंके नाम मीमांसासूत्रोंमें भी उल्लिखित हैं । श्रीमद्भगवद्गीतामें भी 'हेतुमद्' विशेषणसहित 'ब्रह्मसूत्र'का नाम आता है, इससे भी इसकी परम प्राचीनता सिद्ध होती है । बादरायण शब्द पुरातनकालसे ही श्रीवेदव्यासजीके लिये व्यवहृत होता आया है । अतः ब्रह्मसूत्र वेदव्यासजीकी ही रचना है, यह माननेमें कोई बाधा नहीं है । पाणिनिने पाराशर्य व्यासद्वारा रचित 'भिक्षुसूत्र' की भी चर्चा अपने सूत्रोंमें की है । वह अब उपलब्ध नहीं है । अथवा यह भी सम्भव है, वह ब्रह्मसूत्रसे अभिन्न रहा हो । सूत्रकारने अपने ग्रन्थको चार अध्यायों और सोलह पादोंमें विभक्त किया है । पहले अध्यायमें बताया गया है कि सभी वेदान्तवाक्योंका एकमात्र परब्रह्मके प्रतिपादनमें ही अन्वय है; इसीलिये उसका नाम 'समन्वयाध्याय' है । दूसरे अध्यायमें सब प्रकारके विरोधाभासोंका निराकरण किया गया है, इसलिये उसका नाम अविरोधाध्याय' है । तीसरेमें परब्रह्मकी प्राप्ति या साक्षात्कारके साधनभूत ब्रह्मविद्या तथा दूसरी-दूसरी उपासनाओंके विषयमें निर्णय किया गया है, अतः उसको 'साधनाध्याय' कहते हैं और चौथेमें उन विद्याओंद्वारा साधकको अधिकारके
( ७ ) अनुरूप प्राप्त होनेवाले फलके विषयमें निर्णय किया गया है; इस कारण उसकी 'फलाध्याय' के नामसे प्रसिद्धि है। इस ग्रन्थमें वर्णित समग्र विषयोंका संक्षिप्त परिचय विषय-सूचीसे अवगत हो सकता है। यहाँ कुछ चुनी हुई सैद्धान्तिक बातोंका दिग्दर्शन कराया जाता है। ब्रह्मसूत्रमें पूज्यपाद वेदव्यासजीने अपने सिद्धान्तका प्रतिपादन करते समय मेरी अल्पबुद्धिके अनुसार इस प्रकार निर्णय दिया है— ( १ ) यह प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेवाला जो जडचेतनात्मक जगत् है, इसका उपादान और निमित्तकारण ब्रह्म ही है ( ब्र० सू० १ । १ । २ )। ( २ ) सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरकी जो परा ( चेतन जीवसमुदाय ) और अपरा ( परिवर्तनशील जडवर्ग ) नामक दो प्रकृतियाँ हैं, वे उसीकी अपनी शक्तियाँ हैं, इसलिये उससे अभिन्न हैं ( ३ । २ । २८ )। वह इन शक्तियोंका आश्रय है, अतः इनसे भिन्न भी है। परब्रह्म जीव और जडवर्गसे सर्वथा विलक्षण और उत्तम है ( ३ । २ । ३१ )। ( ३ ) वह परब्रह्म परमेश्वर अपनी उपर्युक्त दोनों प्रकृतियोंको लेकर ही सृष्टिकालमें जगत्की रचना करता है और प्रलयकालमें इन दोनों प्रकृतियोंको अपनेमें विलीन कर लेता है। ( ४ ) परब्रह्म परमात्मा शब्द, स्पर्श आदिसे रहित, निर्विशेष, निर्गुण एवं निराकार भी है तथा अनन्त कल्याणमय गुणसमुदायसे युक्त सगुण एवं साकार भी है। इस प्रकार एक ही परमात्माका यह उभयविध स्वरूप स्वाभाविक तथा परम सत्य है, औपाधिक नहीं है ( ३ । २ । ११ से २६ तक )। ( ५ ) जीव-समुदाय उस परब्रह्मकी परा प्रकृतिका समूह है, इसलिये उसीका अंश है ( २ । ३ । ४३ )। इसी दृष्टिसे वह अभिन्न भी है। तथापि परमेश्वर जीवके कर्मफलोंकी व्यवस्था करनेवाला ( ३ । २ । ३८ ) सबका नियन्ता और स्वामी है। ( ६ ) जीव नित्य है ( २ । ३ । १७ )। उसका जन्मना और मरना शरीरके सम्बन्धसे औपचारिक है ( २ । ३ । १६ )। ( ७ ) जीवका एक शरीरसे दूसरे शरीरमें और लोकान्तरमें भी जाना- आना शरीरके सम्बन्धसे ही है। ब्रह्मलोकमें भी वह सूक्ष्मशरीरके सम्बन्धसे ही जाता है ( ४ । २ । ९ )।
( ८ ) ( ८ ) परब्रह्म परमेश्वरके परमधाममें पहुँचनेपर ज्ञानीका किसी प्रकारके प्राकृत शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, वह अपने दिव्यस्वरूपसे सम्पन्न होता है ( ४ । ४ । १ ) । वह उसकी सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित मुक्तावस्था है ( ४ । ४ । २ )। ( ९ ) कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवाले जीवको वहाँके भोगोंका उपभोग संकल्पमात्रसे भी होता है और उसके संकल्पानुसार प्राप्त हुए शरीरके द्वारा भी ( ४ । ४ । ८ ) तथा ( ४ । ४ । १२ ) । ( १० ) देवयान-मार्गसे जानेवाले विद्वानोंमेंसे कोई तो परब्रह्मके परमधाममें जाकर सायुज्य मुक्ति-लाभ कर लेते है ( ४ । ४ । ४ ) और कोई चैतन्यमात्र स्वरूपसे अलग भी रह सकते है ( ४ । ४ । ७ ) । ( ११ ) कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवाले उस लोकके स्वामीके साथ प्रलय- कालके समय सायुज्यमुक्तिको प्राप्त हो जाते हैं ( ४ । ३ । १० ) । ( १२ ) उत्तरायण-मार्गसे ब्रह्मलोकमें जानेवालोंके लिये रात्रिकाल या दक्षिणायनकालमें मृत्यु होना बाधक नहीं है ( ४ । २ । १९-२० )। ( १३ ) जीवका कर्तापन शरीर और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे औपचारिक है ( २ । ३ । ३३ से ४० तक )। ( १४ ) जीवके कर्तापनमें परमात्मा ही कारण है ( २ । ३ । ४१ ) । ( १५ ) जीवात्मा विभु है; उसका एकदेशित्व शरीरके सम्बन्धसे ही है, वास्तवमें नहीं है ( २ । ३ । २९ ) । ( १६ ) जिन ज्ञानी महापुरुषोंके मनमें किसी प्रकारकी कामना नहीं रहती, जो सर्वथा निष्काम और आप्तकाम हैं, उनको यहीं ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है । उनका ब्रह्मलोकमें जाना नहीं होता । ( १७ ) ज्ञानी महापुरुष लोकसंग्रहके लिये सभी प्रकारके विहित कर्मोंका अनुष्ठान कर सकता है ( ४ । १ । १६-१७ ) । ( १८ ) ब्रह्मज्ञान सभी आश्रमोंमें हो सकता है । सभी आश्रमोंमें ब्रह्म- विद्याका अधिकार है ( ३ । ४ । ४९ ) । ( १९ ) ब्रह्मलोकमें जानेवालेका पुनरागमन नहीं होता ( ४ । ४ । २२)।
( ९ ) ( २० ) ज्ञानीके पूर्वकृत संचित पुण्य-पापका नाश हो जाता है। नये कर्मोंसे उसका सम्बन्ध नहीं होता ( ४ । १ । १३-१४ )। प्रारब्धकर्मका उपभोगद्वारा नाश हो जानेपर वर्तमान शरीर नष्ट हो जाता है और वह ब्रह्म- लोकको या वहीं परमात्माको प्राप्त हो जाता है ( ४ । १ । १९ )। ( २१ ) ब्रह्मविद्याके साधकको यज्ञादि आश्रमकर्म भी निष्कामभावसे करने चाहिये ( ३ । ४ । २६ )। शम-दम आदि साधन अवश्य कर्तव्य हैं ( ३ । ४ । २७ )। ( २२ ) ब्रह्मविद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है ( ३ । ४ । २ से २५ तक )। ( २३ ) परमात्माकी प्राप्तिका हेतु ब्रह्मज्ञान ही है ( ३ । ३ । ४७ ) तथा ( ३ । ४ । १ )। ( २४ ) यह जगत् प्रलयकालमे भी अप्रकटरूपसे वर्तमान रहता है ( २ । १ । १६ )। इन सबको ध्यानमें रखकर इस ग्रन्थका अनुशीलन करना चाहिये । इससे परमात्माका क्या स्वरूप है, उनकी प्राप्तिके कौन-से साधन हैं और साधकका परमात्माके साथ क्या सम्बन्ध है—इन बातोकी तथा साधनोपयोगी अन्य आवश्यक विषयोकी जानकारी प्राप्त करके एक निश्चयपर पहुँचनेमे विशेष सहायता प्राप्त हो सकती है। अतः प्रत्येक साधकको श्रद्धापूर्वक इस ग्रन्थका अध्ययन एवं मनन करना चाहिये । श्रीरामनवमी } विनीत, संवत् २००९ वि० } हरिकृष्णदास गोयन्दका
[चित्र: मध्य में चतुर्भुज भगवान् विष्णु का विग्रह एवं चारों ओर यन्त्र/ज्यामितीय आकृति]
सूत्र विषय पृष्ठ
ॐ श्रीपरमात्मने नमः वेदान्त-दर्शन (ब्रह्मसूत्र) के प्रधान विषयोंकी सूची पहला अध्याय पहला पाद सूत्र विषय पृष्ठ १-११ ब्रह्मविषयक विचारकी प्रतिज्ञा तथा ब्रह्म ही जगत्का अभिन्न निमित्तोपादान कारण है, जड-प्रकृति नहीं, इसका युक्ति एवं प्रमाणोंद्वारा प्रतिपादन ... ... १-८ १२-१९ श्रुतिमें 'आनन्दमय' शब्द परमात्माका ही वाचक है, जीवात्मा अथवा जडप्रकृतिका नहीं, इसका समर्थन ... ८-१३ २०-२१ 'विज्ञानमय' तथा 'सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष'की ब्रह्मरूपताका कथन ... १३-१४ २२-२७ 'आकाश', 'प्राण', 'ज्योति' तथा 'गायत्री' नामसे श्रुतिमें परब्रह्मका ही वर्णन है, इसका प्रतिपादन ... १४-१८ २८-३१ कौषीतकि श्रुतिमें भी 'प्राण' नामसे ब्रह्मका ही उपदेश हुआ है, इसका समर्थन ... ... १८-२१ दूसरा पाद १-७ वेदान्त-वाक्योंमें परब्रह्मकी ही उपास्यताका निरूपण तथा जीवात्माकी उपास्यताका निराकरण ... ... २२-२७ ८ सबके हृदयमें रहते हुए भी परमात्मा जीवोंके सुख-दुःखोंका भोग नहीं करता, इसका प्रतिपादन ... ... २७ ९-१० चराचरग्राही भोक्ता परमात्मा ही हैं, इसका निरूपण ... २८ ११-१२ हृदयगुहामें स्थित दो आत्मा—जीवात्मा तथा परमात्मा- का प्रतिपादन ... ... २९-३० १३-१७ नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषकी ब्रह्मरूपता ... ... ३०-३४ १८ अधिदेव आदिमें अन्तर्यामी 'रूप'से ब्रह्मकी स्थिति ... ३५ १९-२० जडप्रकृति और जीवात्माकी अन्तर्यामिताका निराकरण ... ३५-३६ २१-२२ श्रुतिमें जिसे अदृश्यत्व आदि धर्मोंसे युक्त बताया है, वह ब्रह्म है, प्रकृति या जीवात्मा नहीं; इसका प्रतिपादन ... ३७-३९ २३—रूपोपन्यासात्से ब्रह्मकारणवादका समर्थन ... ... ३९
सूत्र विषय पृष्ठ
( १२ ) सूत्र विषय पृष्ठ २४-२८ श्रुतिमे 'वैश्वानर' नाम ब्रह्मके लिये ही आया है, इसका युक्तियुक्त विवेचन ... ... ३९-४४ २९-३२ सर्वव्यापी परमात्माको देशविशेषसे सम्बद्ध बतानेका रहस्य ... ४४-४६ तीसरा पाद १-७ द्युलोक और पृथ्वी आदिका आधार ब्रह्म ही है, जीवात्मा अथवा प्रकृति नहीं, इसका प्रतिपादन ... ... ४७-५० ८-९ ब्रह्म ही भूमा है—इसका उपपादन ... ... ५१-५३ १०-१२ श्रुतिमे ब्रह्मको 'अक्षर' कहा गया है, इसका युक्तियुक्त समर्थन ५३-५५ १३ 'ॐ' इस अक्षरके द्वारा ध्येय तत्त्व भी ब्रह्म ही है, इसका निरूपण ५५ १४-२३ दहराकाशकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन ... ... ५६-६२ २४-२५ अङ्गुष्ठमात्र पुरुषकी परब्रह्मरूपता और उसे हृदयमे स्थित बतानेका रहस्य ... ... ६२-६३ २६-३० ब्रह्मविद्यामे मनुष्योके सिवा देवताओके भी अधिकारका प्रतिपादन और इसमे सम्भावित विरोधका परिहार ... ६३-६७ ३१-३३ यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्मविद्यामें देवताओके अधिकारका जैमिनि- द्वारा विरोध और बादरायणद्वारा उसका परिहार ... ६७-६९ ३४-३८ वेदविद्यामें शूद्रके अनधिकारका कथन ... ... ६९-७३ ३९ अङ्गुष्ठमात्र पुरुषके ब्रह्मरूप होनेमें दूसरी युक्ति ... ७४ ४०-४३ 'ज्योति' तथा 'आकाश' भी ब्रह्मके ही वाचक हैं, इसका समर्थन ... ... ७५-७७ चौथा पाद १-२ सांख्योक्त प्रकृतिकी अवैदिकताके प्रसङ्गमे 'अव्यक्त' शब्दपर विचार और उसके शरीरवाचक होनेका कथन ... ७८-७९ ३-५ वेदोक्त प्रकृति स्वतन्त्र और ज्ञेय नहीं, परमेश्वरके अधीन रहनेवाली उसीकी शक्ति है, इसका प्रतिपादन ... ८०-८२ ६-७ 'अव्यक्त' शब्द प्रकृतिसे भिन्न अर्थका वाचक क्यों है ? इसका युक्तिपूर्ण विवेचन ... ... ८२-८३ ८-१० श्रुतिमे 'अजा' शब्द परब्रह्मकी शक्तिविशेषका बोधक है, सांख्योक्त प्रधानका नहीं, इसका प्रतिपादन ... ८४-८६ ११-१३ 'पञ्च-पञ्चजनाः' शब्दसे सांख्योक्त प्रकृतिके पचीस तत्त्वोंका श्रुतिमे वर्णन किया गया है, इस मान्यताका खण्डन ... ८६-८८
( १३ ) सूत्र विषय पृष्ठ १४-१५ { आकाश आदिकी सृष्टिमे ब्रह्म ही कारण है तथा उस प्रसङ्गमे ... { आये हुए 'असत्' आदि शब्द भी उसीके वाचक हैं, { इसका समर्थन ... ... ८८-९० १६-२२ { कौषीतकि श्रुतिमे सोलह पुरुषोंका कर्ता एवं ज्ञेयतत्त्व ब्रह्मको { ही बताया गया है, जीव, प्राण या प्रकृतिको नहीं, इसका { सयुक्तिक उपपादन ... ... ९१-९५ २३-२९ ब्रह्मकी अभिन्न निमित्तोपादान कारणताका निरूपण ... ९५-१०१ दूसरा अध्याय पहला पाद १-११ { सांख्योक्त प्रधानको जगत्का कारण न माननेसे सम्भावित { दोषोंका उल्लेख और उनका परिहार ... ... १०२-१०९ १२ अन्य वेदविरोधी मतोंका निराकरण ... ... १०९ १३-१४ ब्रह्मकारणवादके विरुद्ध उठायी हुई शङ्काओंका समाधान ... १०९-१११ १५-२० { युक्तियो और दृष्टान्तोंद्वारा सत्कार्यवादकी स्थापनासे एवं ब्रह्मसे { जगत्की अनन्यता ... ... १११-११४ २१-२३ उक्त अनन्यतामें सम्भावित 'हिताकरण' आदि दोषोंका परिहार ११५-११७ २४-२५ { ब्रह्मके द्वारा संकल्पमात्रसे बिना साधन-सामग्रीके ही जगत्की { रचनाका कथन ... ... ११७-११९ २६-२८ { ब्रह्मकारणवादमे सम्भावित अन्यान्य दोष तथा श्रुति- { विरोधका परिहार ... ... ११९-१२१ २९-३० सांख्यमतमें दोष दिखाकर ग्रन्थकारद्वारा अपने सिद्धान्तकी पुष्टि १२२-१२३ ३१-३३ { कारण और प्रयोजनके बिना ही परमेश्वरद्वारा सङ्कल्पमात्रसे { होनेवाली जगत्की सृष्टि उनकी लीलामात्र है—इसका प्रतिपादन १२३-१२४ ३४-३५ ब्रह्ममें आरोपित विषमता और निर्दयता दोषका निराकरण १२५-१२७ ३६-३७ { जीवों और उनके कर्मोंकी अनादि सत्ताका प्रतिपादन तथा { ब्रह्मकारणवादमें विरोधके अभावका कथन ... १२७-१२८ दूसरा पाद १-१० { अनेक प्रकारके दोष दिखाकर सांख्योक्त प्रधान कारणवाद- { का खण्डन ... १२९-१३५ ११-१७ वैशेषिकोंके परमाणुकारणवादका निराकरण ... १३६-१४१ १८-३२ बौद्धमतकी असङ्गतियोंको दिखाते हुए उसका खण्डन ... १४१-१५१ ३३-३६ जैनमतमे पूर्वापरविरोध दिखाते हुए उसका खण्डन ... १५२-१५४ ३७-४१ पाशुपतमतका खण्डन ... १५४-१५७
सूत्र विषय पृष्ठ०
( १४ ) सूत्र विषय पृष्ठ० ४२-४५ पाञ्चरात्र आगममें उठायी हुई आंशिक अनुपपत्तियोंका परिहार १५७-१६० तीसरा पाद १-९ ब्रह्मसे आकाश और वायुकी उत्पत्तिका उपपादन करके ब्रह्मके सिवा, सबकी उत्पत्ति-शीलताका कथन ... १६१-१६५ १०-१३ वायुसे तेजकी, तेजसे जलकी और जलसे पृथिवीकी उत्पत्तिमे भी ब्रह्म ही कारण है, इसका प्रतिपादन ... १६५-१६७ १४-१५ सृष्टिक्रमके विपरीत प्रलयक्रमका कथन तथा इन्द्रियोंकी उत्पत्तिमें क्रमविशेषका अभाव ... ... १६७-१६९ १६-२० जीवके जन्म-मृत्यु-वर्णनकी औपचारिकता तथा जीवात्माकी नित्यता ... ... ... १७०-१७३ २१-२९ जीवात्माके अणुत्वका खण्डन और विभुत्वका स्थापन ... १७३-१७८ ३०-३२ जीव शरीरके सम्बन्धसे एकदेशी है, सत् जीवात्माका ही सृष्टि- कालमें प्राकट्य होता है और वह अन्तःकरणके सम्बन्धसे विषयोंका अनुभव करता है; इसका प्रतिपादन ... १७८-१८१ ३३-४२ जीवात्माका कर्त्तापन शरीर और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे औप- चारिक है तथा उसमे परमात्मा ही कारण हैं; क्योंकि वह उन्हींके अधीन है, इसका निरूपण ... ... १८२-१८८ ४३-४७ जीवात्मा ईश्वरका अंग है, किंतु ईश्वर उसके दोषोंसे लिप्त नहीं होता; इसका प्रतिपादन ... ... १८९-१९३ ४८-५० नित्य एवं विभु जीवोंके लिये देहसम्बन्धसे विधि-निषेधकी सार्थकता और उनके कर्मोंका विभाग ... ... १९३-१९४ ५१-५३ जीव और ब्रह्मके अंशांशिभावको औपाधिक माननेमे सम्भावित दोषोंका उल्लेख ... ... १९५-१९६ चौथा पाद १-४ इन्द्रियोंकी उत्पत्ति भूतोंसे नहीं परमात्मासे ही होती है, इसका प्रतिपादन और श्रुतियोंके विरोधका परिहार ... १९७-१९९ ५-७ इन्द्रियोंकी संख्या सात ही है, इस मान्यताके खण्डनपूर्वक मन- सहित ग्यारह इन्द्रियोंकी सिद्धि तथा सूक्ष्मभूतोंकी भी ब्रह्मसे उत्पत्तिका कथन ... ... ... १९९-२०१ ८-१३ मुख्य प्राणको ब्रह्मसे ही उत्पत्ति बताकर उसके स्वरूपका निरूपण ... ... ... २०१-२०४ १४-१६ ज्योतिः आदि तत्त्वोंका अधिष्ठाता ब्रह्म और शरीरका अधिष्ठाता नित्य जीवात्मा है, इसका कथन ... २०४-२०५
( १५ ) सूत्र विषय पृष्ठ १७-१९ इन्द्रियोंसे मुख्य प्राणकी भिन्नता ... ... २०५-२०७ २० ब्रह्मसे ही नाम-रूपकी रचनाका कथन ... ... २०७ २१-२२ सब तत्त्वोंका मिश्रण होनेपर भी पृथिवी आदिकी अधिकतासे उनके पृथक्-पृथक् कार्यका निर्देश ... ... २०७-२०८ तीसरा अध्याय पहला पाद १-६ शरीरके बीजभूत सूक्ष्म तत्त्वोंसहित जीवके देहान्तरमे गमन- का कथन, 'पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुषरूप हो जाता है' श्रुतिके इस वचनपर विचार, उस जलमें सभी तत्त्वोंके संमिश्रण- का कथन और अन्यान्य विरोधोंका परिहार ... २०९-२१४ ७-११ स्वर्गमे गये हुए पुरुषको देवताओंका अन्न बताना औपचारिक है, जीव स्वर्गसे कर्मसंस्कारोंको साथ लेकर लौटता है, श्रुतिमें 'चरण' शब्द कर्मसंस्कारोंका उपलक्षण और पाप-पुण्यका बोधक है, इसका उपपादन ... ... २१५-२१८ १२-१७ पापी जीव यमराजकी आज्ञासे नरकमें यातना भोगते हैं, स्वर्गमे नहीं जाते, कौषीतकिश्रुतिमे भी समस्त शुभकर्मियोंके लिये ही स्वर्गगमनकी बात आयी है; इसका वर्णन ... २१८-२२१ १८-२१ यम-यातना छान्दोग्यवर्णित तीसरी गतिसे भिन्न एव अधम चौथी गति है, इसका वर्णन तथा स्वेदज जीवोंका उद्भिजमे अन्तर्भाव २२१-२२३ २२-२७ स्वर्गसे लौटे हुए जीव किस प्रकार आकाश, वायु, धूम, मेघ, धान, जौ आदिमे स्थित होते हुए क्रमशः गर्भमें आते हैं, इसका स्पष्ट वर्णन २२३-२२५ दूसरा पाद १-६ स्वप्न मायामात्र और शुभाशुभका सूचक है, भगवान् ही जीवको स्वप्नमे नियुक्त करते हैं, जीवमें ईश्वरसदृश गुण तिरोहित हैं, परमात्माके ध्यानसे प्रकट होते हैं; उसके अनादि बन्धन और मोक्ष भी परमात्माके सकाशात्से हैं तथा जीवके दिव्य गुणोंका तिरोभाव देहके सम्बन्धसे है ... ... २२६-२३० ७-१० सुषुप्तिकालमें जीवकी नाडियोंके मूलभूत हृदयमें स्थिति, उस समय उसे परमात्मामें स्थित बतानेका रहस्य, सुषुप्तिसे पुनः उसी जीवके जाग्रत् होनेका कथन तथा मूर्च्छाकालमे अधूरी सुषुप्तावस्थाका प्रतिपादन ... ... २३०-२३३
( १६ ) सूत्र विषय पृष्ठ ११-२६ सर्वान्तर्यामी परमात्माका किसी भी स्थान-दोषसे लिप्त न होना, परमेश्वरका निर्गुण निर्विशेष, सगुण सविशेष दोनों लक्षणोंसे युक्त होना, इसमे सम्भावित विरोधका परिहार, उक्त दोनों लक्षणोंकी मुख्यता, परमात्मामे भेदका अभाव, सगुणरूपकी औपाधिकताका निराकरण, प्रतिबिम्बके दृष्टान्तका रहस्य, परमेश्वरमे शरीरके वृद्धि-ह्रास आदि दोषोंका अभाव, निषेध श्रुतियोंद्वारा इयत्तामात्रका प्रतिषेध, निर्गुण-सगुण दोनों स्वरूपोंका मन-बुद्धिसे अतीत होना तथा आराधनासे भगवान्के प्रत्यक्ष दर्शन होनेका कथन ... २३४-२४५ २७-३३ परमात्माका अपनी शक्तियोसे अभेद और भेद तथा अभेदो- पासना और भेदोपासनाके उपदेशका अभिप्राय २४५-२५१ ३४-३७ शरीर आदिके सम्बन्धसे जीवोंके परस्पर भेदकी सिद्धि, प्रकृतियोंमे भेद होनेपर भी परब्रह्ममे भेद या नानात्वका अभाव २५१-२५३ ३८-४१ कर्मोंका फल देनेवाला परमात्मा ही है, कर्म नहीं; इसका प्रतिपादन ... ... ... २५३-२५४ तीसरा पाद १-१० वेदान्तवर्णित समस्त ब्रह्मविद्याओकी एकता, भेद-प्रतीतिका निराकरण, शाखा-विशेषके लिये ही शिरोव्रत आदिका नियम, समानविद्याके प्रकरणमे एक जगह कही हुई बातोंके अन्यत्र अध्याहार करनेका कथन, उद्देश्यकी एकता होनेपर विद्याओंमे भेदका अभाव, ब्रह्मविद्यासे भिन्न विद्याओंकी एकता या भिन्नताके निर्णयमे संज्ञा आदि हेतुओके उपयोगका कथन २५५-२६२ ११-१८ ब्रह्मके 'आनन्द' आदि धर्मोंका ही अन्यत्र अध्याहार उचित- 'प्रियशिरस्त्व' रूपकगत धर्मोंका नहीं, आनन्दमयकी ब्रह्म- रूपता, विरोध-परिहार, तथा अन्न-रसमय पुरुषके ब्रह्म न होनेका प्रतिपादन ... ... ... २६२-२६७ १९-२५ एक शाखामे कही विद्याकी एकता, नेत्र एवं सूर्यमण्डलवर्ती पुरुषोंके नाम और गुणका एक दूसरेमें अध्याहारकी अनावश्यकता, उक्त पुरुषोमे ब्रह्मके सर्वाधारता और सर्व- व्यापकता आदि धर्मोंके, पुरुष-विद्यामे प्रतिपादित दिव्य गुणोंके तथा कठवर्णित वेद्यत्व आदि धर्मोंके भी अध्याहारका अनौचित्य ... ... ... २६७-२७२
( १७ ) सूत्र विषय पृष्ठ २६ ब्रह्मविद्याके फल-वर्णनमे हानि ( दुःखनाश आदि ) और प्राप्ति (परमपदकी प्राप्ति आदि ) दोनों प्रकारके फलोंका सर्वत्र सम्बन्ध ... ... ... २७२-२७४ २७-३२ ब्रह्मलोकमे जानेवाले ज्ञानी महात्माके पुण्य और पापोंकी यहीं समाप्ति, संकल्पानुसार ब्रह्मलोक-गमन या यहीं ब्रह्म- सायुज्यकी प्राप्ति सम्भव, ब्रह्मलोक जानेवाले सभी उपासकोंके लिये देवयानमार्गसे गमनका नियम, किन्तु कारक पुरुषोंके लिये इस नियमका अभाव ... ... २७४-२७८ ३३-४१ अक्षरब्रह्मके लक्षणोंका सर्वत्र ब्रह्मके वर्णनमे अध्याहार आवश्यक, मुण्डक, कठ और श्वेताश्वतर आदिमे जीव और ईश्वरको एक साथ हृदयमे स्थित बतानेवाली विद्याओकी एकता, ब्रह्म जीवात्माका भी अन्तर्यामी आत्मा है, इसमे विरोधका परिहार, जीव और ब्रह्मके भेदकी औपाधिकताका निराकरण एवं विरोध-परिहार ... ... २७८-२८६ ४२-५२ ब्रह्मलोकमे जानेवाले सभी पुरुषोंके लिये भोग भोगनेका अनिवार्य नियम नहीं, बन्धनसे मोक्ष ही विद्याका मुख्य फल, कर्मसे मुक्तिका प्रतिपादन करनेवाले पूर्वपक्षका उल्लेख और खण्डन, ब्रह्मविद्यासे ही मुक्तिका प्रतिपादन तथा साधकोंके भावानुसार विद्याके फलमे भेद ... ... २८६-२९४ ५३-५४ शरीरसे भिन्न आत्माकी सत्ता न माननेवाले नास्तिक-मतका खण्डन ... ... २९४-२९५ ५५-६० यज्ञाङ्गसम्बन्धी उपासना प्रत्येक वेदकी शाखावालोके लिये अनुष्ठेय है, एक-एक अङ्गकी अपेक्षा, सब अङ्गोंसे पूर्ण उपासना श्रेष्ठ है, शब्दादि भेदसे विद्याओंमे भिन्नता है, फल एक होनेसे साधककी इच्छाके अनुसार उनके अनुष्ठानमे विकल्प है; किंतु भिन्न-भिन्न फलवाली उपासनाओंके अनुष्ठानमे कामनाके अनुसार एकाधिक उपासनाओंका समुच्चय भी हो सकता है— इन सब बातोका वर्णन ... ... २९५-२९८ ६१-६६ यज्ञाङ्ग-सम्बन्धी उपासनाओमे समुच्चय या समाहारका खण्डन ... २९८-३०० चौथा पाद १ ज्ञानसे ही परम पुरुषार्थकी सिद्धि .. ३०१ २-७ ‘विद्या कर्मका अङ्ग है’ जैमिनिके इस मतका उल्लेख ... ३०२-३०४ ८-१७ जैमिनिके उक्त मतका खण्डन तथा ‘विद्याकर्मका अङ्ग नहीं, ब्रह्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है’ इस सिद्धान्तकी पुष्टि ३०५-३१० —
( १८ ) सूत्र विषय पृष्ठ १८-२० पूर्वपक्षके खण्डनपूर्वक संन्यास-आश्रमकी सिद्धि ... ३१०-३१२ २१-२२ अपूर्व फलदायिनी उद्गीथ आदि उपासनाओंका विधान ... ३१३-३१४ २३-२४ { उपनिषद्वर्णित कथाएँ विद्याका ही अङ्ग हैं, यज्ञका नहीं; इसका प्रतिपादन ... ... ३१४-३१५ २५ ब्रह्मविद्यारूप यज्ञमें अग्नि ईंधन आदिकी अपेक्षाका अभाव ३१५-३१६ २६-२७ { विद्याकी प्राप्तिके लिये वर्णाश्रमोचित कर्मोंकी अपेक्षा तथा शम-दम आदिकी अनिवार्य आवश्यकता ... ३१६-३१८ २८-३१ { प्राणसङ्कटके सिवा अन्य समयमें आहार-शुद्धिविषयक सदाचारके त्यागका निषेध ... ... ३१८-३२० ३२-३३ ज्ञानीके लिये लोकसंग्रहार्थ आश्रमकर्मके अनुष्ठानकी आवश्यकता ३२१ ३४-३९ { भक्तिसम्बन्धी श्रवण-कीर्तन आदि कर्मोंके अनुष्ठानकी अनिवार्य आवश्यकता तथा भागवतधर्मकी महत्ताका प्रतिपादन ... ३२१-३२७ ४०-४३ { वानप्रस्थ, संन्यास आदि ऊँचे आश्रमोंसे वापस लौटनेका निषेध, लौटनेवालेका पतन और ब्रह्मविद्या आदिमें अनधिकार ... ३२७-३२९ ४४-४६ { उद्गीथ आदिमे की जानेवाली उपासनाका कर्ता तो ऋत्विक् है किंतु उसके फलमें यजमानका अधिकार है, इसका वर्णन ३२९-३३० ४७-५० संन्यास, गृहस्थ आदि सब आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार ३३१-३३४ ५१-५२ { मुक्तिरूप फल इस जन्ममें मिलता है या जन्मान्तरमें, इसी लोक- मे मिलता है, या लोकान्तरमे ? इसका नियम नहीं है यह कथन ३३४-३३५ चौथा अध्याय पहला पाद १-२ { उपदेश-ग्रहणके पश्चात् ब्रह्मविद्याके निरन्तर अभ्यासकी आवश्यकता ... ... ... ३३६-३३७ ३ आत्मभावसे परब्रह्मके चिन्तनका उपदेश ... ३३७-३३८ ४-५ प्रतीकमे आत्मभावनाका निषेध और ब्रह्मभावनाका विधान ... ३३८-३३९ ६ उद्गीथ आदिमे आदित्य आदिकी भावना ... ३३९ ७-१० आसनपर बैठकर उपासना करनेका विधान ... ३४०-३४१ ११ जहाँ चित्त एकाग्र हो, वही स्थान उपासनाके लिये उत्तम ३४१-३४२ १२ आजीवन उपासनाकी विधि ... ३४२-३४३ १३-१४ { ब्रह्मसाक्षात्कारके पश्चात् ज्ञानीका भूत और भावी शुभाशुभ कर्मोंसे असम्बन्ध ... ... ... ३४३-३४४ १५ शरीरके हेतुभूतप्रारब्ध कर्मका भोगके लिये नियत समयतक रहना ३४५
( १९ ) सूत्र विषय पृष्ठ १६-१७ ज्ञानीके लिये अग्निहोत्र आदि तथा अन्य विहित कर्मोंका लोकसंग्रहार्थ विधान ... ... ३४५-३४६ १८ कर्माङ्ग उपासनाका ही कर्मके साथ समुच्चय ... ३४७ १९ प्रारब्धका भोगसे नाश होनेपर ज्ञानीको ब्रह्मकी प्राप्ति ... ३४७ दूसरा पाद १-४ उत्क्रमणकालमे वाणीकी अन्य इन्द्रियोंके साथ मनमे, मनकी प्राणमे और प्राणकी जीवात्मामें स्थितिका कथन ... ३४८-३४९ ५-६ जीवात्माकी सूक्ष्मभूतोंमें स्थिति ... ... ३५०-३५१ ७ ब्रह्मलोकका मार्ग आरम्भ होनेसे पूर्वतक ज्ञानी और अज्ञानी- की समान गतिका प्रतिपादन ... ... ३५१ ८ अज्ञानी जीवका परब्रह्ममे स्थित रहना प्रलयकालकी भाँति है ... ३५१-३५२ ९-११ जीवात्मा उत्क्रमणके समय जिस आकाश आदि भूतसमुदाय- मे स्थित होता है, वह सूक्ष्मशरीर है, इसका प्रतिपादन ... ३५२-३५३ १२-१६ निष्काम ज्ञानी महात्माओंका ब्रह्मलोकमे गमन नहीं होता, वे यहीं परमात्माको प्राप्त हो जाते है, इसका निरूपण ... ३५४-३५६ १७ सूक्ष्मशरीरमें स्थित जीव किस प्रकार ब्रह्मलोकमे जानेके लिये सुषुम्ना नाडीद्वारा शरीरसे निकलता है, इसका वर्णन ... ३५७-३५८ १८ शरीरसे निकलकर जीवात्माका सूर्य-रश्मियोंमे स्थित होना ३५८ १९-२० रात्रि और दक्षिणायनकालमे भी सूर्यरश्मियोंसे उसका बाधारहित सम्बन्ध ... ... ३५८-३६० २१ योगीके लिये गीतोक्त कालविशेषका नियम ३६० तीसरा पाद १ ब्रह्मलोकमे जानेके लिये 'अर्चिरादि' एक ही मार्गका कथन ३६१-३६२ २ संवत्सरमे ऊपर और सूर्यलोकके नीचे वायुलोककी स्थिति ३६२-३६३ ३ 'विद्युत्' से ऊपर वरुणलोककी स्थिति ... ३६३ ४ 'अर्चिः', 'अहः', 'पक्ष', 'मास', 'अयन' आदि आतिवाहिक पुरुष हैं, इसका प्रतिपादन ... ... ३६३-३६४ ५ अर्चि आदिको अचेतन माननेमे आपत्ति ... ३६४ ६ विद्युत्लोकसे ऊपर ब्रह्मलोकतक अमानव पुरुषके साथ जीवात्माका गमन ... ... ३६४-३६५ ७-११ 'ब्रह्मलोकमे कार्यब्रह्मकी प्राप्ति होती है', इस बादरिके मतका वर्णन ... ... ३६५-३६७ १२-१४ 'ब्रह्मलोकमे परब्रह्मकी प्राप्ति होती है' इस जैमिनिमतका उपपादन ... ... ३६७-३६९
( २० ) सूत्र विषय पृष्ठ १५-१६ प्रतीकोपासना करनेवालोंके सिवा अन्य सभी उपासक ब्रह्मलोकमे जाकर संकल्पानुसार कार्यब्रह्म अथवा परब्रह्मको प्राप्त होते हैं, यह बादरायणका सिद्धान्त ... ३६९-३७० चौथा पाद १-३ परब्रह्मपरायण जीवके लिये परमधाममे पहुँचकर अपने वास्तविकस्वरूपसे सम्पन्न होने एवं सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो विशुद्ध आत्मरूपसे स्थित होनेका कथन ... ३७१-३७२ ४-६ ब्रह्मलोकमें पहुँचनेवाले उपासकोंकी तीन गति—(१)अभिन्न- रूपसे ब्रह्ममे मिल जाने, (२) पृथक् रहकर परमात्माके सदृश दिव्यस्वरूपसे सम्पन्न होने तथा (३) केवल चैतन्यमात्र स्वरूपसे स्थित होनेका वर्णन ... ३७३-३७४ ७ उपासकके भावानुसार तीनो ही स्थितियोको माननेमे कोई विरोध नहीं है, यह बादरायणका सिद्धान्त ... ३७४-३७५ ८-९ प्रजापति ब्रह्माके लोकमे जानेवाले उपासकोंको संकल्पसे ही वहाँके भोगोकी प्राप्ति ... ३७५-३७६ १० उन उपासकोंके शरीर नहीं होते; यह बादरिका मत ... ३७६ ११ 'उन्हें शरीरकी प्राप्ति होती है' यह जैमिनिका मत ... ३७६ १२ संकल्पानुसार उनके शरीरका होना और न होना दोनों ही बाते सम्भव हैं—यह बादरायणका सिद्धान्त ... ३७७ १३-१४ वे बिना शरीरके स्वप्नकी भाँति और शरीर धारण करके जाग्रत्की भाँति भोगोका उपभोग करते है, यह कथन ... ३७७-३७८ १५-१६ सुषुप्ति-प्रलय एवं ब्रह्मसायुज्यकी प्राप्तिके प्रसंगमे ही नाम- रूपके अभावका कथन ... ३७८-३७९ १७-१८ ब्रह्मलोकमे गये हुए उपासक वहाँके भोग भोगनेके उद्देश्यसे अपने लिये इच्छानुसार शरीर-निर्माण कर सकते है, संसारकी रचना नहीं, इसका प्रतिपादन ... ३७९-३८० १९-२० ब्रह्मलोकमें जानेवाले मुक्तात्माको निर्विकार ईश्वररूप फलकी प्राप्तिका कथन ... ३८१-३८२ २१ निर्लिप्तभावसे भोगमात्रमे उसे ब्रह्माकी समता प्राप्त होती है, सृष्टिरचनामे नहीं ... ३८२ २२ ब्रह्मलोकसे पुनरावृत्ति नहीं होती, इसका प्रतिपादन ... ३८२-३८३ सूत्रोंकी वर्णानुक्रम-सूची ... ... १ से १२ (अन्तमें)
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ॐ श्रीपरमात्मने नमः वेदान्त-दर्शन ( ब्रह्मसूत्र ) ( साधारण भाषा-टीकासहित ) पहला अध्याय पहला पाद अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १ । १ । १ ॥ अथ=अब; अतः=यहाँसे; ब्रह्मजिज्ञासा=ब्रह्मविषयक विचार ( आरम्भ किया जाता है ) । व्याख्या—इस सूत्रमे ब्रह्मविषयक विचार आरम्भ करनेकी बात कहकर यह सूचित किया गया है कि ब्रह्म कौन है ? उसका स्वरूप क्या है ? वेदान्तमे उसका वर्णन किस प्रकार हुआ है ?—इत्यादि सभी ब्रह्मविषयक बातोंका इस ग्रन्थ- मे विवेचन किया जाता है । सम्बन्ध—पूर्व सूत्रमें जिस ब्रह्मके विषयमें विचार करनेकी प्रतिज्ञा की गयी है, उसका लक्षण बतलाते हैं— जन्माद्यस्य यतः ॥ १ । १ । २ ॥ अस्य=इस जगत्के; जन्मादि=जन्म आदि ( उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय ); यतः=जिससे ( होते हैं, वह ब्रह्म है ) । व्याख्या—यह जो जड़-चेतनात्मक जगत् सर्वसाधारणके देखने, सुनने और अनुभवमें आ रहा है, जिसकी अद्भुत रचनाके किसी एक अंशपर भी विचार करनेसे बड़े-बड़े वैज्ञानिकोको आश्चर्यचकित होना पड़ता है, इस विचित्र विश्वके जन्म आदि जिससे होते हैं अर्थात् जो सर्वशक्तिमान् परात्पर परमेश्वर अपनी अलौकिक शक्तिसे इस सम्पूर्ण जगत्की रचना करता है, इसका धारण, पोषण तथा नियमितरूपसे सञ्चालन करता है; फिर प्रलयकाल आनेपर जो इस समस्त विश्वको अपनेमें विलीन कर लेता है, वह परमात्मा ही ब्रह्म है । वे० द० १—
२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ भाव यह है कि देवता, दैत्य, दानव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि अनेक जीवो- से परिपूर्ण, सूर्य, चन्द्रमा, तारा तथा नाना लोक-लोकान्तरोसे सम्पन्न इस अनन्त ब्रह्माण्डका कर्ता-हर्ता कोई अवश्य है, यह हरेक मनुष्यकी समझमे आ सकता है; वही ब्रह्म है। उसीको परमेश्वर, परमात्मा और भगवान् आदि विविध नामोसे कहते हैं; क्योकि वह सबका आदि, सबसे बड़ा, सर्वाधार, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वव्यापी और सर्वरूप है। यह दृश्यमान जगत् उसकी अपार शक्तिके किसी एक अंशका दिग्दर्शनमात्र है। शङ्का—उपनिषदोमे तो ब्रह्मका वर्णन करते हुए उसे अकर्ता, अभोक्ता, असङ्ग, अव्यक्त, अगोचर, अचिन्त्य, निर्गुण, निरञ्जन तथा निर्विशेष बताया गया है और इस सूत्रमें उसे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलयका कर्ता बताया गया है। यह विपरीत बात कैसे ? समाधान—उपनिषदोमे वर्णित परब्रह्म परमेश्वर इस सम्पूर्ण जगत्का कर्ता होते हुए भी अकर्ता है (गीता ४। १३)। अतः उसका कर्तापन साधारण जीवोकी भाँति नहीं है; सर्वथा अलौकिक है। वह सर्वशक्तिमान्* एवं सर्वरूप होनेमे समर्थ होकर भी सबसे सर्वथा अतीत और असङ्ग है। सर्वगुणसम्पन्न होते हुए भी निर्गुण है† तथा समस्त विशेषणोसे युक्त होकर भी निर्विशेष‡ है। इस
- परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च । ( श्वेता० ६ । ८ ) 'इस परमेश्वरकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक दिव्य शक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है।' † एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ ( श्वेता० ६ । ११ ) 'वह एक देव ही सब प्राणियोमे छिपा हुआ, सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोका अन्तर्यामी परमात्मा है; वही सबके कर्मोंका अधिष्ठाता, सम्पूर्ण भूतोका निवास-स्थान, सबका साक्षी, चेतनस्वरूप, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत है।' ‡ एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्॥ ( मा० उ० ६ ) 'यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह सबका अन्तर्यामी है, यह सम्पूर्ण जगत्का कारण है; क्योकि समस्त प्राणियोकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका स्थान यही है।' नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्य-
सूत्र ३-४ ] अध्याय १ ३
सूत्र ३-४ ] अध्याय १ ३ प्रकार उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरमें विपरीत भावोंका समावेश स्वाभाविक होनेके कारण यहाँ शङ्काके लिये स्थान नहीं है। सम्बन्ध-कर्तापन और भोक्तापनसे रहित, नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्मको इस जगत्का कारण कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं— शास्त्रयोनित्वात् ॥ १ । १ । ३ ॥ शास्त्रयोनित्वात् = शास्त्र (वेद-) में उस ब्रह्मको जगत्का कारण बताया गया है, इसलिये (उसको जगत्का कारण मानना उचित है)। व्याख्या-वेदमें जिस प्रकार ब्रह्मके सत्य, ज्ञान और अनन्त (तै० उ० - २ । १) आदि लक्षण बताये गये हैं, उसी प्रकार उसको जगत्का कारण भी बताया गया है। * इसलिये पूर्वसूत्रके कथनानुसार परब्रह्म परमेश्वरको जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण मानना सर्वथा उचित ही है। सम्बन्ध-मृत्तिका आदि उपादानोंसे घट आदि वस्तुओंकी रचना करने- वाले कुम्भकार आदिकी भाँति ब्रह्मको जगत्का निमित्त कारण बतलाना तो युक्तिसङ्गत है; परन्तु उसे उपादान कारण कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं— तत्तु समन्वयात् ॥ १ । १ । ४ ॥ चह्वार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ (मा० उ० ७) 'जो न भीतरकी ओर प्रज्ञावाला है, न बाहरकी ओर प्रज्ञावाला है, न दोनों ओर प्रज्ञावाला है; न प्रज्ञानघन है, न जाननेवाला है, न नहीं जाननेवाला है; जो देखा नहीं गया है, जो व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता, जो पकड़नेमें नहीं आ सकता, जिसका कोई लक्षण नहीं है, जो चिन्तन करनेमें नहीं आ सकता, जो बतलानेमें नहीं आ सकता, एकमात्र आत्माकी प्रतीति ही जिसका सार है, जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है, ऐसा सर्वथा शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्त्व परब्रह्म परमात्माका चतुर्थ पाद है, इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी मानते हैं। वह परमात्मा है; वह जाननेयोग्य है।'
- 'एष योनिः सर्वस्य' (मा० उ० ६) 'यह परमात्मा सम्पूर्ण जगत्का कारण है।' 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति ।' (तै० उ० ३ । १) 'ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं तथा अन्तमें प्रयाण करते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं, उसको जाननेकी इच्छा कर, वही ब्रह्म है।'
४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ तु=तथा; तत्=वह ब्रह्म; समन्वयात्=समस्त जगत्में पूर्णरूपसे अनुगत (व्यास) होनेके कारण (उपादान भी है)। व्याख्या—जिस प्रकार अनुमान और शास्त्र-प्रमाणसे यह सिद्ध होता है कि इस विचित्र जगत्का निमित्त कारण परब्रह्म परमेश्वर है, उसी प्रकार यह भी सिद्ध है कि वही इसका उपादान कारण भी है; क्योंकि वह इस जगत्मे पूर्णतया अनुगत (व्यास) है, इसका अणुमात्र भी परमेश्वरसे शून्य नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीतामे भी भगवान्ने कहा है कि 'चर या अचर, जड या चेतन, ऐसा कोई भी प्राणी या भूतसमुदाय नहीं है, जो मुझसे रहित हो।' (१० । ३९) 'यह सम्पूर्ण जगत् मुझसे व्याप्त है।' (गीता ९ । ४) उपनिषदोंमें भी स्थान-स्थानपर यह बात दुहरायी गयी है कि 'उस परब्रह्म परमेश्वरसे यह समस्त जगत् व्याप्त है।'* सम्बन्ध—सांख्यमतके अनुसार त्रिगुणात्मिका प्रकृति भी समस्त जगत्में व्याप्त है, फिर व्याप्तिरूप हेतुसे जगत्का उपादान कारण ब्रह्मको ही क्यों मानना चाहिये, प्रकृतिको क्यों नहीं ? इसपर कहते हैं— ईक्षतेर्नाशब्दम् ॥ १ । १ । ५ ॥ ईक्षतेः=श्रुतिमे 'ईक्ष' धातुका प्रयोग होनेके कारण; अशब्दम्=शब्द- प्रमाण-शून्य प्रधान-(त्रिगुणात्मिका जड प्रकृति); न=जगत्का कारण नहीं है। व्याख्या—उपनिषदोंमे जहाँ सृष्टिका प्रसङ्ग आया है, वहाँ 'ईक्ष' धातुकी क्रियाका प्रयोग हुआ है; जैसे 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छा० उ० ६ । २ । १) इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजा- येय' (छा० उ० ६ । २ । ३) अर्थात् 'उस सत्ने ईक्षण—सङ्कल्प किया कि मै बहुत हो जाऊँ, अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ।' ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार दूसरी जगह भी 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीत्' इस प्रकार आरम्भ करके 'स ईक्षत लोकान्नु सृजै' (ऐ० उ० १ । १ । १) अर्थात् उसने ईक्षण—विचार किया कि निश्चय ही मै लोकोंकी रचना करूँ।' ऐसा कहा है। परन्तु त्रिगुणात्मिका प्रकृति जड है, उसमे ईक्षण या सङ्कल्प नहीं
- ईशावास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । ( ईशा० १ )