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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

सूत्र १८-२१ ] अध्याय १ १३

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सूत्र १८-२१ ] अध्याय १ १३ का जड प्रकृतिमे अथवा अपने ही-जैसे परतन्त्र दूसरे किसी जीवमे लय होना नहीं बन सकता। इसलिये एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही 'आनन्दमय' शब्दका वाच्यार्थ है और वही सम्पूर्ण जगत्का कारण है; दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध—तैत्तिरीय-श्रुतिमें जहाँ आनन्दमयका प्रकरण आया है, वह 'विज्ञानमय' शब्दसे जीवात्माको ग्रहण किया गया है, किन्तु बृहदारण्यक ( ४ । ४ । २२ ) में 'विज्ञानमय' को हृदयाकाशमें शयन करनेवाला अन्तरात्मा बताया गया है। अतः जिज्ञासा होती है कि वहाँ 'विज्ञानमय' शब्द जीवात्मा- का वाचक है अथवा ब्रह्मका ? इसी प्रकार छान्दोग्य ( १ । ६ । ६ ) में जो सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुषका वर्णन आया है, वहाँ भी यह शङ्का हो सकती है कि इस मन्त्रमें सूर्यके अधिष्ठाता देवताका वर्णन हुआ है या ब्रह्मका ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ १ । १ । २० ॥ अन्तः = हृदयके भीतर शयन करनेवाला विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलके भीतर स्थित हिरण्मय पुरुष ब्रह्म है; तद्धर्मोपदेशात् = क्योकि ( उसमे ) उस ब्रह्मके धर्मोंका उपदेश किया गया है। व्याख्या—उपर्युक्त बृहदारण्यक-श्रुतिमे वर्णित विज्ञानमय पुरुषके लिये इस प्रकार विशेषण आये हैं—'सर्वस्य वशी सर्वस्येशान. सर्वस्याधिपतिः' एष सर्वेश्वर एष भूतपालः' इत्यादि। तथा छान्दोग्यवर्णित सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती पुरुषके लिये 'सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः' ( सब पापोंसे ऊपर उठा हुआ ) यह विशेषण दिया गया है। ये विशेषण परब्रह्म परमेश्वरमें ही सम्भव हो सकते हैं। किसी भी स्थिति- को प्राप्त देव, मनुष्य आदि योनियोंमें रहनेवाले जीवात्माके ये धर्म नहीं हो सकते। इसलिये वहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष समझना चाहिये; अन्य किसीको नहीं। सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— भेदव्यपदेशाच्चान्यः ॥ १ । १ । २१ ॥ च=तथा; भेदव्यपदेशात् = भेदका कथन होनेसे; अन्यः = सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भिन्न है।

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१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या-बृहदारण्यकोपनिषद्‌के अन्तर्यामिब्राह्मणमें कहा है कि- 'य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।' अर्थात् जो सूर्यमें रहनेवाला सूर्यका अन्तर्वर्ती है, जिसे सूर्य नहीं जानता, सूर्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर सूर्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ।' इस प्रकार वहाँ सूर्यन्तर्वर्ती पुरुषका सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भेद बताया गया है; इसलिये वह हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठातासे भिन्न परब्रह्म परमात्मा ही है । सम्बन्ध-यहाँतकके विवेचनसे यह सिद्ध किया गया कि जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका निमित्त और उपादान कारण परब्रह्म परमेश्वर ही है; जीवात्मा या जड प्रकृति नहीं। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि श्रुति (छा० उ० १ । ९ । १ ) में जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण आकाशको भी बताया गया है, फिर ब्रह्मका लक्षण निश्चित करते हुए यह कैसे कहा गया कि जिससे जगत्‌के जन्म आदि होते हैं, वह ब्रह्म है । इसपर कहते हैं- आकाशस्तल्लिङ्गात् ॥ १ । १ । २२ ॥ आकाशः=( वहाँ ) 'आकाश' शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है; तल्लिङ्गात्=क्योकि ( उस मन्त्रमे ) जो लक्षण बताये गये हैं, वे उस ब्रह्मके ही हैं। व्याख्या-छान्दोग्य ( १ । ९ । १ ) में इस प्रकार वर्णन आया है- 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशम्प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ।' अर्थात् 'ये समस्त भूत ( पञ्चतत्त्व और समस्त प्राणी ) निःसन्देह आकाशसे ही उत्पन्न होते है और आकाशमे ही विलीन होते हैं । आकाश ही इन सबसे श्रेष्ठ और बड़ा है । वही इन सबका परम आधार है ।' इसमे आकाशके लिये जो विशेषण आये है, वे भूताकाशमे सम्भव नहीं हैं; क्योंकि भूताकाश तो स्वयं भूतोंके समुदायमे आ जाता है । अतः उससे भूतसमुदायकी या प्राणियोंकी उत्पत्ति बतलाना सुसङ्गत नहीं है । उक्त लक्षण एकमात्र परब्रह्म परमात्मामे ही सङ्गत हो सकते है । वही सर्वश्रेष्ठ, सबसे बड़ा और सर्वाधार है; अन्य कोई नहीं । इसलिये यही सिद्ध होता है कि उस श्रुतिमे 'आकाश' नामसे परब्रह्म परमेश्वरको ही जगत्‌का कारण बताया गया है ।

सूत्र २२—२४ ] अध्याय १ १५

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सूत्र २२—२४ ] अध्याय १ १५ सम्बन्ध-अब प्रश्न उठता है कि श्रुति (छा० उ० १ । ११ । ५) में आकाशकी ही भाँति प्राणको भी जगत्‌का कारण बतलाया गया है; वहाँ 'प्राण' शब्द किसका वाचक है ? इसपर कहते हैं— अत एव प्राणः ॥ १ । १ । २३ ॥ अत एव = इसीलिये अर्थात् श्रुतिमे कहे हुए लक्षण ब्रह्ममे ही सम्भव है, इस कारण वहाँ; प्राणः = प्राण (भी ब्रह्म ही है) । व्याख्या-छान्दोग्य (१ । ११ । ५) में कहा है कि 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते ।' अर्थात् 'निश्चय ही ये सब भूत प्राणमें ही विलीन होते हैं और प्राणसे ही उत्पन्न होते हैं।'-ये लक्षण प्राणवायुमे नहीं घट सकते; क्योकि समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय- का कारण प्राणवायु नहीं हो सकता । अतः यहाँ 'प्राण' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन हुआ है, ऐसा मानना चाहिये । सम्बन्ध-पूर्व प्रकरणमें तो ब्रह्मसूचक लक्षण होनेसे आकाश तथा प्राणको ब्रह्मका वाचक मानना उचित है; किन्तु छान्दोग्योपनिषद् (३ । १३ । ७) में जिस ज्योति (तेज) को समस्त विश्वसे ऊपर सर्वश्रेष्ठ परमधाममें प्रकाशित बताया हे तथा जिसकी शरीरान्तर्वर्ती पुरुषमें स्थित ज्योतिके साथ एकता बतायी गयी हे, उसके लिये वहाँ कोई ऐसा लक्षण नहीं बताया गया हे, जिससे उसको ब्रह्मका वाचक माना जाय । इसलिये यह जिज्ञासा होती हे कि उक्त 'ज्योतिः' शब्द किसका वाचक हे ? इसपर कहते हैं— ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॥ १ । १ । २४ ॥ चरणाभिधानात् = (उस प्रसङ्गमे ) उक्त ज्योतिके चार पादोका कथन होने- से; ज्योतिः = 'ज्योतिः' शब्द वहाँ ब्रह्मका वाचक है । व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायमे 'ज्योति.' का वर्णन इस प्रकार हुआ है—'अथ यदत. परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वत. पृष्ठेषु सर्वत पृष्ठेष्वनुत्तमे- षूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्त. पुरुषे ज्योति. ।' (३ । १३ । ७) अर्थात् 'जो इस स्वर्गलोकसे ऊपर परम ज्योति प्रकाशित हो रही है, वह समस्त विश्वके पृष्ठपर (सबके ऊपर ), जिससे उत्तम दूसरा कोई लोक नहीं है, उस सर्वोत्तम 'परमधाममे

पादोंका कथन है और समस्त भूतसमुदायको उसका एक पाद बताकर शेष तीन

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१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ प्रकाशित हो रही है, वह निस्सन्देह यही है जो कि इस पुरुषमें आन्तरिक ज्योति है।' इस प्रसङ्गमें आया हुआ 'ज्योतिः' शब्द जड प्रकाशका वाचक नहीं है, यह बात तो इसमे वर्णित लक्षणोंसे ही स्पष्ट हो जाती है। तथापि यह 'ज्योतिः' शब्द किसका वाचक है ? ज्ञानका या जीवात्माका अथवा ब्रह्मका ? इसका निर्णय नहीं होता; अतः सूत्रकार कहते हैं कि यहाँ जो 'ज्योतिः' शब्द आया है, वह ब्रह्म- का ही वाचक है; क्योंकि इसके पूर्व बारहवें खण्डमे इस ज्योतिर्मय ब्रह्मके चार पादोंका कथन है और समस्त भूतसमुदायको उसका एक पाद बताकर शेष तीन पादोंको अमृतस्वरूप तथा परमधाममें स्थित बताया है ।* इसलिये इस प्रसङ्गमे आया हुआ 'ज्योतिः' शब्द ब्रह्मके सिवा अन्य किसीका वाचक नहीं हो सकता । माण्डूक्योपनिषद्मे आत्माके चार पादोंका वर्णन करते हुए उसके दूसरे पादको तैजस कहा है। यह 'तैजस' भी 'ज्योतिः'का पर्याय ही है। अतः 'ज्योतिः'की भाँति 'तैजस' शब्द भी ब्रह्मका ही वाचक है, जीवात्मा या अन्य किसी प्रकाशका नहीं। इस बातका निर्णय भी इसी प्रसङ्गके अनुसार समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँ यह शङ्का होती है कि छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्याय- के बारहवें खण्डमें 'गायत्री'के नामसे प्रकरणका आरम्भ हुआ है। गायत्री एक छन्दका नाम है। अतः उस प्रसङ्गमें ब्रह्मका वर्णन है, यह कैसे माना जाय ? इसपर कहते हैं— छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगदात्- तथा हि दर्शनम् ॥ १ । १ । २५ ॥ चेत्=यदि कहो ( उस प्रकरणमे ); छन्दोऽभिधानात्=गायत्री छन्दका कथन होनेके कारण ( उसीके चार पादोंका वर्णन है ); न=ब्रह्मके चार पादोंका वर्णन नहीं है; इति न=तो यह ठीक नहीं ( क्योंकि ); तथा=उस प्रकारके वर्णनद्वारा;

  • वह मन्त्र इस प्रकार है— तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्या- मृतं दिवि ॥ ( छा० उ० ३ । १२ । ६ )

सूत्र २५-२६ ] अध्याय १ १७

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सूत्र २५-२६ ] अध्याय १ १७ चेतोऽर्पणनिगदात्=ब्रह्ममे चित्तका समर्पण बताया गया है; तथा हि दर्शनम्= वैसा ही वर्णन दूसरी जगह भी देखा जाता है। व्याख्या—पूर्व प्रकरणमे 'गायत्री ही यह सब कुछ है' (छा० उ० ३ । १२ । १) इस प्रकार गायत्रीछन्दका वर्णन होनेसे उसीके चार पादोका वहाँ वर्णन है, ब्रह्मका नहीं; ऐसी धारणा बना लेना ठीक नहीं है; क्योकि गायत्रीनामक छन्दके लिये यह कहना नहीं बन सकता कि यह जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् गायत्री ही है। इसलिये यहाँ ऐसा समझना चाहिये कि सबके परम कारण सर्वात्मक परब्रह्म परमेश्वरमे चित्तका समाधान करानेके लिये उस ब्रह्मका ही वहाँ इस प्रकार गायत्री-नामसे वर्णन किया गया है। इसी तरह अन्यत्र भी उद्गीथ, प्रणव आदि नामोके द्वारा ब्रह्मका वर्णन देखा जाता है। सूक्ष्म तत्त्वमे बुद्धिका प्रवेश करानेके लिये, किसी प्रकारकी समानताको लेकर स्थूल वस्तुके नामसे उसका वर्णन करना उचित ही है। सम्बन्ध—इस प्रकरणमे 'गायत्री' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है, इस बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं— भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् ॥ १ । १ । २६ ॥ भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेः=(यहाँ ब्रह्मको ही गायत्रीके नामसे कहा गया है, यह माननेमे ही) भूत आदिको पाद बतलाना युक्तिसंगत हो सकता है, इसलिये; च=भी; एवम्=ऐसा ही है। व्याख्या—छान्दोग्य (३ । १२) के प्रकरणमे गायत्रीको भूत, पृथिवी, शरीर और हृदयरूप चार पादोसे युक्त बताया गया है। फिर उसकी महिमाका वर्णन करते हुए 'पुरुष' नामसे प्रतिपादित परब्रह्म परमात्माके साथ उसकी एकता करके समस्त भूतोको (अर्थात् प्राणि-समुदायको) उसका एक पाद् बतलाया गया है और अमृतस्वरूप तीन पादोको परमधाममे स्थित कहा गया है। (छा० उ० ३ । १२।६)। इस वर्णनकी सङ्गति तभी लग सकती है, जब कि 'गायत्री'शब्दको गायत्री-छन्दका वाचक न मानकर परब्रह्म परमात्माका वाचक माना जाय। इसलिये यही मानना ठीक है। सम्बन्ध—उक्त सिद्धान्तकी पुष्टिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उपस्थित करके उसका समाधान करते हैं— वे० द० २—

पाद दिव्य लोकमे हैं' यह कहकर दिव्य लोकको ब्रह्मके तीन पादोका आधार

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१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥ १ । १ । २७ ॥ चेत्=यदि कहो; उपदेशभेदात्=उपदेशमें भिन्नता होनेसे; न=गायत्रीशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं है; इति न=तो यह कथन ठीक नहीं है; उभयस्मिन् अपि= क्योकि दो प्रकारका वर्णन होनेपर भी; अविरोधात्=( वास्तवमें ) कोई विरोध नहीं है । व्याख्या—यदि कहा जाय कि पूर्वमन्त्र ( ३ । १२ । ६) मे तो 'तीन पाद दिव्य लोकमे हैं' यह कहकर दिव्य लोकको ब्रह्मके तीन पादोका आधार बताया गया है और बादमे आये हुए मन्त्र ( ३ । १३ । ७) मे 'ज्योति:' नामसे वर्णित ब्रह्मको उस दिव्य लोकसे परे बताया है । इस प्रकार पूर्वापरके वर्णन- मे भेद होनेके कारण गायत्रीको ब्रह्मका वाचक बताना सङ्गत नहीं है; तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि दोनो जगहके वर्णनकी शैलीमे किञ्चित् भेद होनेपर भी वास्तवमे कोई विरोध नहीं है । दोनो स्थलोमे श्रुतिका उद्देश्य गायत्रीशब्द- वाच्य तथा ज्योतिःशब्दवाच्य ब्रह्मको सर्वोपरि परम धाममे स्थित बतलाना ही है । सम्बन्ध—'अत एव प्राणः' (१ । १ । २३) इस सूत्रमें यह सिद्ध किया गया है कि श्रुतिमें 'प्राण' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन है; किन्तु कौषीतकि-उपनिषद् ( ३ । २ ) में प्रतर्दनके प्रति इन्द्रने कहा हे कि 'मैं ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ; तू आयु तथा अमृतरूपसे मेरी उपासना कर ।' इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि इस प्रकरणमें आया हुआ 'प्राण' शब्द किसका वाचक है? इन्द्रका ? प्राणवायुका ? जीवात्माका ? अथवा ब्रह्मका ? इसपर कहते हैं— प्राणस्तथानुगमात् ॥ १ । १ । २८ ॥ प्राणः=प्राणशब्द ( यहाँ ब्रह्मका ही वाचक है ); तथानुगमात्=क्योकि पूर्वापरके प्रसङ्गपर विचार करनेसे ऐसा ही ज्ञात होता है । व्याख्या—इस प्रकरणमे पूर्वापर प्रसङ्गपर भलीभाँति विचार करनेसे 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक सिद्ध होता है, अन्य किसीका नहीं; क्योंकि आरम्भमे प्रतर्दनने परम पुरुषार्थरूप वर माँगा है । उसके लिये परम हितपूर्ण इन्द्रके उपदेशमें कहा हुआ 'प्राण' 'ब्रह्म' ही होना चाहिये । ब्रह्मज्ञानसे बढ़कर दूसरा कोई हितपूर्ण उपदेश नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त उक्त प्राणको वहाँ प्रज्ञान-

सूत्र २७-२९ ] अध्याय १ १९

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सूत्र २७-२९ ] अध्याय १ १९ स्वरूप बतलाया गया है, जो कि ब्रह्मके ही अनुरूप है तथा अन्तमें उसीको आनन्दस्वरूप अजर एवं अमर कहा गया है। फिर उसीको समस्त लोकोंका पालक, अधिपति एवं सर्वेश्वर बताया गया है। * ये सब बातें ब्रह्मके ही उपयुक्त हैं। प्रसिद्ध प्राणवायु, इन्द्र अथवा जीवात्माके लिये ऐसा कहना उपयुक्त नहीं हो सकता। इसलिये यही समझना चाहिये कि यहाँ 'प्राण'शब्द ब्रह्मका ही वाचक है। सम्बन्ध—उक्त प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्ट शब्दोंमें स्वयं अपनेको ही प्राण कहा है। इन्द्र एक प्रभावशाली देवता तथा अजर, अमर हैं ही; फिर वहाँ 'प्राण' शब्दको इन्द्रका ही वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्ध- भूमा ह्यस्मिन् ॥ १।१।२९॥ चेत्=यदि कहो; वक्तुः=वक्ता (इन्द्र) का (उद्देश्य); आत्मोपदेशात् = अपनेको ही 'प्राण' नामसे बतलाना है, इसलिये; न=प्राणशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता; इति=( नो ) यह कथन: ( न )=ठीक नहीं है; हि=क्योंकि; अस्मिन् = इस प्रकरणमें; अध्यात्मसम्बन्धभूमा=अध्यात्मसम्बन्धी उपदेशकी बहुलता है। व्याख्या—यदि कहो कि इस प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्टरूपसे अपने आपको ही प्राण बतलाया है, ऐसी परिस्थितिमें 'प्राण'शब्दको इन्द्रका वाचक न मानकर ब्रह्मका वाचक मानना ठीक नहीं है; तो ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि इस प्रकरणमें अध्यात्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता है।† यहाँ आधिदैविक वर्णन नहीं है; अतः उपास्यरूपसे बतलाया हुआ तत्त्व इन्द्र नहीं हो सकता। इसलिये यहाँ 'प्राण' शब्दको ब्रह्मका ही वाचक समझना चाहिये।

  • कौषीतकि-उपनिषद्में यह प्रसङ्ग इस प्रकार है— स होवाच प्रतर्दनस्त्वमेव वृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं मन्यस इति...।' (कौ० उ० ३। १) 'स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा।' (कौ० उ० ३। २) 'एष प्राण एव प्रज्ञात्माऽऽ- नन्दोऽजरोऽमृतः••••••एष लोकपाल एष लोकाधिपतिरेष सर्वेश्वरः।' (कौ० उ० ३। ९) † इस प्रसङ्गमें अध्यात्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता किस प्रकार है, यह पूर्वसूत्रकी टिप्पणीमें देखें।
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२० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सम्बन्ध-यहाँ यह प्रश्न उठता है कि यदि 'प्राण' शब्द इन्द्रका वाचक नहीं है तो इन्द्रने जो यह कहा कि 'मै ही प्रज्ञानस्वरूप प्राण हूँ, तू मेरी उपासना कर।' इस कथनकी क्या गति होगी ? इसपर कहते हैं— शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ॥ १ । १ । ३० ॥ उपदेशः=( यहाँ ) इन्द्रका अपनेको प्राण बतलाना; तु=तो; वामदेववत्= वामदेवकी भाँति; शास्त्रदृष्ट्या=( केवल ) शास्त्र-दृष्टिसे है । व्याख्या-बृहदारण्यकोपनिषद् ( १ । ४ । १० ) मे यह वर्णन आया है कि 'तद् यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धैत- त्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभव सूर्यश्चेति।' अर्थात् 'उस ब्रह्मको देवताओमे जिसने जाना, वही ब्रह्मरूप हो गया । इसी प्रकार ऋषियो और मनुष्योमें भी जिसने उसे जाना, वह तद्रूप हो गया । उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना कि मै मनु हुआ और मै ही सूर्य हुआ।' इससे यह बात सिद्ध होती है कि जो महापुरुष उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है, वह उसके साथ एकताका अनुभव करता हुआ ब्रह्मभावापन्न होकर ऐसा कह सकता है । अतएव उस वामदेव ऋषिकी भाँति ही इन्द्रका ब्रह्मभावापन्न-अवस्थामे शास्त्रदृष्टिसे यह कहना है कि 'मैं ही ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हूँ । तू मुझ परमात्माकी उपासना कर।' अतः 'प्राण' शब्दको ब्रह्मका वाचक माननेमे कोई आपत्ति नहीं रह जाती है । सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे शङ्का उपस्थित करके उसके समाधानद्वारा प्राणको ब्रह्मका वाचक सिद्ध करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं-- जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रित- त्वादिह तद्योगात् ॥ १ । १ । ३१ ॥ चेत्=यदि कहो; जीवमुख्यप्राणलिङ्गात्=( इस प्रसङ्गके वर्णनमे ) जीवात्मा तथा प्रसिद्ध प्राणके लक्षण पाये जाते है, इसलिये; न=प्राण शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं है; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं है; उपासात्रैविध्यात्=क्योकि ऐसा माननेपर त्रिविध उपासनाका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; आश्रितत्वात्=( इसके

सूत्र ३०-३१ ] अध्याय १ २१

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सूत्र ३०-३१ ] अध्याय १ २१ सिवा ) सब लक्षण ब्रह्मके आश्रित है ( तथा ); इह तद्योगात् = इस प्रसङ्गमें ब्रह्मके लक्षणोंका भी कथन है, इसलिये ( यहाँ 'प्राण'शब्द ब्रह्मका ही वाचक है) । व्याख्या--कौषीतकि-उपनिषद् ( ३ । ८ ) के उक्त प्रसङ्गमे जीवके लक्षणों- का इस प्रकार वर्णन हुआ है—'न वाचं विजिज्ञासीत। वक्तारं विद्यात् ।' अर्थात् 'वाणीको जाननेकी इच्छा न करे। वक्ताको जानना चाहिये।' यहाँ वाणी आदि कार्य और करणके अध्यक्ष जीवात्माको जाननेके लिये कहा है। इसी प्रकार प्रसिद्ध प्राणके लक्षणका भी वर्णन मिलता है—'अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति ।' ( ३ । ३ ) अर्थात् 'निस्सन्देह प्रज्ञात्मा प्राण ही इस शरीरको ग्रहण करके उठाता है।' शरीरको धारण करना मुख्य प्राणका ही धर्म है; इस कथनको लेकर यदि यह कहो कि 'प्राण'शब्द ब्रह्मवाचक नहीं होना चाहिये, तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योकि ब्रह्मके अतिरिक्त जीव और प्राणको भी उपास्य माननेसे त्रिविध उपासनाका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, जो उचित नहीं है। इसके सिवा, जीव और प्राण आदिके धर्मोंका आश्रय भी ब्रह्म ही है, इसलिये ब्रह्मके वर्णनमे उनके धर्मोंका आना अनुचित नहीं है। यहाँ ब्रह्मके लोकाधिपति, लोकपाल आदि लक्षणोंका भी स्पष्ट वर्णन मिलता है। इन सब कारणोंसे यहाँ 'प्राण' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है । इन्द्र, जीवात्मा अथवा प्रसिद्ध प्राणका नहीं—यही मानना ठीक है। पहला पाद सम्पूर्ण।

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दूसरा पाद प्रथम पादमे यह निर्णय किया गया कि 'आनन्दमय', 'आकाश', 'ज्योति' तथा 'प्राण' आदि नामोंसे उपनिषद्मे जो जगत्के कारणका और उपास्यदेवका वर्णन आया है, वह परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है। 'प्राण'शब्दका प्रसङ्ग आनेसे छान्दोग्योपनिषद् (३।१४।२) मे आये हुए 'मनोमयः प्राण- शरीरः' आदि वचनोंका स्मरण हो आया। अतः उक्त उपनिषद्के तीसरे अध्यायके चौदहवें खण्डपर विचार करनेके लिये द्वितीय पाद प्रारम्भ करते हैं। इस पादमे यह पहला प्रकरण आठ सूत्रोंका है। छान्दोग्योपनिषद् (३।१४।१) में पहले तो सम्पूर्ण जगत्‌को ब्रह्मरूप समझकर उसकी उपासना करनेके लिये कहा गया है। उसके बाद उसके लिये 'सत्यसंकल्प', 'आकाशात्मा' और 'सर्व- कर्मा' आदि विशेषण दिये गये है (३।१४।२), जो कि जीवात्माके प्रतीत होते हैं। तत्पश्चात् उसीको 'अणीयान्' अर्थात् अत्यन्त छोटा और 'ज्यायान्' अर्थात् सबसे बड़ा बताकर हृदयके भीतर रहनेवाला अपना आत्मा और ब्रह्म भी कहा है (३।१४। ३-४)। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त उपास्यदेव कौन है ? जीवात्मा या परमात्मा अथवा कोई दूसरा ही ? इसका निर्णय करनेके लिये यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् ॥ १।२।१॥ सर्वत्र = सम्पूर्ण वेदान्त-वाक्योंमे; प्रसिद्धोपदेशात् = (जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और लयके कारणरूपने ) प्रसिद्ध परब्रह्मका ही उपास्यदेवके रूपमें उपदेश हुआ है, इसलिये (छान्दोग्यश्रुति ३।१४ में बताया हुआ उपास्यदेव ब्रह्म ही है)। व्याख्या = छान्दोग्योपनिषद् अध्याय ३ के चौदहवे खण्डके आरम्भमें सबसे पहले यह मन्त्र आया है—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत । अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेत. प्रेत्य भवति , स क्रतुं कुर्वीत ।' अर्थात् 'यह सम्पूर्ण चराचर जगत् निश्चय ब्रह्म ही है; क्योकि यह उसीसे उत्पन्न हुआ है, स्थितिके समय उसीमे चेष्टा करता हैं और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है । साधकको राग-द्वेषरहित शान्तचित्त होकर इस

सूत्र १-२ ] अध्याय १ २३

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सूत्र १-२ ] अध्याय १ २३ प्रकार उपासना करनी चाहिये । अर्थात् ऐसा ही निश्चयात्मक भाव धारण करना चाहिये; क्योकि यह मनुष्य संकल्पमय है । इस लोकमे यह जैसे संकल्पसे युक्त होता है, यहाँसे चले जानेपर परलोकमे यह वैसा ही बन जाता है । अतः उसे उपर्युक्त निश्चय करना चाहिये ।' इस मन्त्रवाक्यमे उसी परब्रह्मकी उपासना करनेके लिये कहा गया है, जिससे इस जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते है तथा जो समस्त वेदान्तवाक्योमें जगत्के महाकारणरूपसे प्रसिद्ध है । अतः इस प्रकरणमे बताया हुआ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा नहीं। सम्बन्ध-यहाँ यह प्रश्न उठता है कि छा० उ० (३।१४।२) में उपास्यदेवको मनोमय और प्राणरूप शरीरवाला कहा गया है । ये विशेषण जीवात्माके हैं; अतः उसको ब्रह्म मान लेनेसे उस वर्णनकी सङ्गति कैसे लगेगी ? इसपर कहते हैं— विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ॥ १।२।२॥ च=तथा; विवक्षितगुणोपपत्तेः=श्रुतिद्वारा वर्णित गुणोकी सङ्गति उस परब्रह्ममें ही होती है. इसलिये (इस प्रकरणमे कथित उपास्यदेव ब्रह्म ही है) । व्याख्या-छा० उ० (३।१४।२) मे उपास्यदेवका वर्णन इस प्रकार उपलब्ध होता है—'मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ।' अर्थात् 'वह उपास्यदेव मनोमय, प्राणरूप शरीरवाला, प्रकाशस्वरूप, सत्य-संकल्प, आकाशके सदृश व्यापक, सम्पूर्ण जगत्का कर्ता, पूर्णकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस समस्त जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाणीरहित तथा संभ्रमशून्य है।' इस वर्णनमे उपास्यदेवके जो उपादेय गुण बताये गये है, वे सब ब्रह्ममे ही सङ्गत होते है । ब्रह्मको 'मनोमय' तथा 'प्राणरूप शरीरवाला' कहना भी अनुचित नहीं है; क्योंकि वह सबका अन्तर्यामी आत्मा है । केनोपनिषद्मे उसको मनका भी मन तथा प्राणका भी प्राण बताया है *। इसलिये इस प्रकरणमे बतलाया. हुआ उपास्यदेव परब्रह्म परमेश्वर ही है । सम्बन्ध-उपर्युक्त सूत्रमें श्रुतिवर्णित गुणोंकी उपपत्ति (सङ्गति) ब्रह्ममें

  • श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाच५ स उ प्राणस्य प्राणः । (के० उ० १।२)
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२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ बतायी गयीं; अब जीवात्मामें उन गुणोंकी अनुपपत्ति बताकर पूर्वोक्त सिद्धान्तकी पुष्टि की जाती है— अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥ १ । २ । ३ ॥ तु=परन्तु; अनुपपत्तेः=जीवात्मामें श्रुतिवर्णित गुणोंकी सङ्गति न होनेके कारण; शारीरः=जीवात्मा; न=( इस प्रकरणमें कहा हुआ उपास्यदेव ) नहीं है। व्याख्या—उपासनाके लिये श्रुतिमें जो सत्य-संकल्पता, सर्वव्यापकता, सर्वात्मकता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुण बताये गये हैं, वे जीवात्मामें नहीं पाये जाते; इस कारण इस प्रसङ्गमें बताया हुआ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है, ऐसा मानना ही ठीक है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी बातको सिद्ध किया जाता है— कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ॥ १ । २ । ४ ॥ कर्मकर्तृव्यपदेशात्=उक्त प्रकरणमें उपास्यदेवको प्राप्तिक्रियाका कर्म अर्थात् प्राप्त होने योग्य कहा है और जीवात्माको प्राप्तिक्रियाका कर्ता अर्थात् उस ब्रह्मको प्राप्त करनेवाला बताया है, इसलिये; च=भी ( जीवात्मा उपास्य नहीं हो सकता ) । व्याख्या—छा० उ० (३ । १४ । ४) में कहा गया है कि 'सर्वकर्मा आदि विशेषणोंसे युक्त ब्रह्म ही मेरे हृदयमें रहनेवाला मेरा आत्मा है; मरनेके बाद यहाँसे जाकर परलोकमें मैं इसीको प्राप्त होऊँगा ।'* इस प्रकार यहाँ पूर्वोक्त उपास्यदेवको प्राप्त होने योग्य तथा जीवात्माको उसे पानेवाला कहा गया है। अतः यहाँ उपास्य- देव परब्रह्म परमात्मा है और उपासक जीवात्मा। यही मानना उचित है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः उक्त बातकी ही पुष्टि करते हैं—

  • 'एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद् वा सर्षपाद् वा श्यामाकाद् वा श्यामाकतण्डुलाद् वैष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरि- क्षाज्ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥' ( छा० उ० ३ । १४ । ३ ) 'सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्मान्तर्हृदय एतद् ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मि ।' ( छा० उ० ३ । १४ । ४ )

सूत्र ३-६ ] अध्याय १ २५

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सूत्र ३-६ ] अध्याय १ २५ शब्दविशेषात् ॥ १ । २ । ५ ॥ शब्दविशेषात् = ( उपास्य और उपासकके लिये ) शब्दका भेद होनेके कारण भी ( यह सिद्ध होता है कि यहाँ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है ) । व्याख्या—छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रमे कहा गया है* कि 'यह मेरे हृदयके अंदर रहनेवाला अन्तर्यामी आत्मा है । यह ब्रह्म है ।' इस कथनमें 'एषः' ( यह ) 'आत्मा' तथा 'ब्रह्म' ये प्रथमान्त शब्द उपास्यदेवके लिये प्रयुक्त हुए हैं और 'मे' अर्थात् 'मेरा' यह षष्ठ्यन्त पद भिन्नरूपसे उपासक जीवात्माके लिये प्रयुक्त हुआ है । इस प्रकार दोनोके लिये प्रयुक्त हुए शब्दोंमे भेद होनेके कारण उपास्यदेव जीवात्मासे भिन्न सिद्ध होता है । अतः जीवात्माको उपास्यदेव नहीं माना जा सकता । सम्बन्ध—इसके सिवा— स्मृतेश्च ॥ १ । २ । ६ ॥ स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे; च=भी ( उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है ) । व्याख्या—श्रीमद्भगवद्गीता आदि स्मृति-ग्रन्थसे भी उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है । जैसे— मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ ( गीता १२ । ८ ) 'मुझमें ही मनको लगा और मुझमे ही बुद्धिको लगा, इसके पश्चात् तू मुझमे ही निवास करेगा अर्थात् मुझे ही प्राप्त करेगा; इसमे कुछ भी संशय नहीं है ।' अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ( गीता ८ । ५) 'और जो पुरुष अन्तकालमे मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्यागकर जाता है, वह मेरे स्वरूपको प्राप्त होता है; इसमे कुछ भी संशय नहीं है ।' अतः इस प्रसङ्गके वर्णनमे उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, आत्मा या अन्य कोई नहीं । यही मानना ठीक है ।

  • ये दोनों मन्त्र चौबीसवें पृष्ठकी टिप्पणीमें देखे ।
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२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध-छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रोंमें उपास्यदेवको हृदयमें स्थित-एकदेशीय बतलाया है तथा तीसरे मन्त्रमें उसे सरसों और साँवाँसे भी छोटा बताया है; इस अवस्थामें उसे परब्रह्म कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं— अर्भकौकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्य- त्वादेवं व्योमवच्च ॥ १ । २ । ७ ॥ चेत्=यदि कहो; अर्भकौकस्त्वात्=उपास्यदेव हृदयरूप छोटे स्थानवाला है, इसलिये; च=तथा; तद्व्यपदेशात्=उसे अत्यन्त छोटा बताया गया है, इस कारण; न=वह ब्रह्म नहीं हो सकता; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं है; निचाय्यत्वात्=क्योंकि (वह) हृदयदेशमें द्रष्टव्य है, इसलिये; एवम्=उसके विषयमे ऐसा कहा गया है; च=तथा; व्योमवत्=वह आकाशकी भाँति सर्वत्र व्यापक है (इस दृष्टिसे भी ऐसा कहना उचित है)। व्याख्या—यदि कोई यह शङ्का करे कि छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रमे उपास्यदेवका स्थान हृदय बताया गया है, जो बहुत छोटा है तथा तीसरे मन्त्रमे उसे धान, जौ, सरसों तथा साँवाँसे भी अत्यन्त छोटा कहा गया है। इस प्रकार एकदेशीय और अत्यन्त लघु बताया जानेके कारण यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म नहीं हो सकता; क्योकि परब्रह्म परमात्माको सबसे बड़ा, सर्वव्यापी तथा सर्वशक्तिमान् बताया गया है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योकि उक्त मन्त्र- मे जो परब्रह्म परमात्माको हृदयमे स्थित बताया गया है, वह उसके उपलब्धि- स्थानकी अपेक्षासे है। भाव यह है कि परब्रह्म परमात्माका स्वरूप आकाशकी भाँति सूक्ष्म और व्यापक है। अतः वह सर्वत्र है। प्रत्येक प्राणीके हृदयमे भी है और उसके बाहर भी * (ईशा० ५)। (गीता १३ । १५)† अतएव

  • तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः। (ईशा० ५) † बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥ (गीता १३ । १५) 'वह परमात्मा चराचर सब भूतोके बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचररूप भी वही है तथा वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है और अत्यन्त समीप एवं दूरसे भी स्थित वही है।'

सूत्र ७-८ ] अध्याय १ २७

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सूत्र ७-८ ] अध्याय १ २७ उसे हृदयस्थ बता देनेमात्रसे उसका एकदेशीय होना सिद्ध नहीं होता तथा जो उसे धान, जौ, सरसो और सार्षोसे भी छोटा बताया गया है, इससे श्रुतिका उद्देश्य उसे छोटे आकारवाला बताना नहीं है, अपितु अत्यन्त सूक्ष्म और इन्द्रियोंद्वारा अग्राह्य ( ग्रहण करनेमे न आनेवाला ) बतलाना है। इसीलिये उसी मन्त्रमे यह भी कहा गया है कि वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक और समस्त लोकोसे भी बड़ा है। भाव यह है कि वह इतना सूक्ष्म होते हुए भी समस्त लोकोंके बाहर-भीतर व्याप्त और उनसे परे भी है। सर्वत्र वही है। इसलिये यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध-परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमे स्थित होकर भी उनके सुख-दुःख- से अभिभूत नहीं होता; उसकी इस विशेषताको बतानेके लिये कहते हैं- संभोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ॥ १ । २ । ८ ॥ चेत्=यदि कहो; संभोगप्राप्तिः=( सबके हृदयमे स्थित होनेसे चेतन होनेके कारण उसको ) सुख-दुःखोंका भोग भी प्राप्त होता होगा; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; वैशेष्यात्=क्योंकि जीवात्माकी अपेक्षा उस परब्रह्ममे विशेषता है। व्याख्या-यदि कोई यह शङ्का करे कि आकाशकी भाँति सर्वव्यापक परमात्मा समस्त प्राणियोंके हृदयमे स्थित होनेके कारण उन जीवोंके सुख-दुःखों- का भोग भी करता ही होगा; क्योकि वह आकाशकी भाँति जड नहीं, चेतन है और चेतनमे सुख-दुःखकी अनुभूति स्वाभाविक है, तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि परमात्मामे कर्तापनका अभिमान और भोक्तापन नहीं है। वह सबके हृदयमे रहता हुआ भी उनके गुण-दोषोसे सर्वथा असङ्ग है। यही जीवोकी अपेक्षा उसमे विशेषता है। जीवात्मा तो अज्ञानके कारण कर्ता और भोक्ता है; किन्तु परमात्मा सर्वथा निर्विकार है। वह केवलमात्र साक्षी है, भोक्ता नहीं (मु० उ० ३ । १ । १)* इसलिये जीवोंके कर्मफलरूप सुख-दुःखादिसे उसका सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है। सम्बन्ध--ऊपर कहे हुए प्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि सबके हृदयमें निवास करते हुए भी परब्रह्म भोक्ता नहीं है; परन्तु वेदान्तमें कहीं-कहीं परमात्मा- को भोक्ता भी बताया गया है ( क० उ० १ । २ । २५ )। फिर वह वचन

  • तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ ( मु० उ० ३ । १ । १ );

प्रकरणाच्च ॥ १ । २ । १० ॥

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२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ किसी अन्यके विषयमें है या उसका कोई दूसरा ही अर्थ है ? यह निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं— अत्ता चराचरग्रहणात् ॥ १ । २ । ९ ॥ चराचरग्रहणात्=चर और अचर सबको ग्रहण करनेके कारण यहाँ; अत्ता=भोजन करनेवाला अर्थात् प्रलयकालमे सबको अपनेमे विलीन करनेवाला ( परब्रह्म परमेश्वर ही है ) । व्याख्या—कठोपनिषद् ( १ । २ । २५) मे कहा गया है कि 'यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥' अर्थात् '( संहारकालमे ) जिस परमेश्वरके ब्राह्मण और क्षत्रिय अर्थात् समस्त स्थावर- जङ्गम प्राणीमात्र भोजन बन जाते हैं तथा सबका संहार करनेवाला मृत्यु उपसेचन ( व्यञ्जन—शाक आदि ) बन जाता है, वह परमेश्वर जहाँ और जैसा है, यह कौन जान सकता है ।' इस श्रुतिमे जिस भोक्ताका वर्णन है, वह कर्मफलरूप सुख-दुःख आदिका भोगनेवाला नहीं है । अपितु संहारकालमें मृत्युसहित समस्त चराचर जगत्को अपनेमें विलीन कर लेना ही यहाँ उसका भोक्तापन है । इसलिये परब्रह्म परमात्माको ही यहाँ अत्ता या भोक्ता कहा गया है, अन्य किसीको नहीं । सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— प्रकरणाच्च ॥ १ । २ । १० ॥ प्रकरणात्=प्रकरणसे; च=भी ( यही बात सिद्ध होती है ) । व्याख्या—उपर्युक्त मन्त्रके पूर्व बीसवेसे चौबीसवेतक परब्रह्म परमेश्वरका ही प्रकरण है । उसीके स्वरूपका वर्णन करके उसे जाननेका महत्त्व तथा उसकी कृपाको ही उसे जाननेका उपाय बताया गया है । उक्त मन्त्रमे भी उस परमेश्वर- को जानना अत्यन्त दुर्लभ बतलाया गया है, जो कि पहलेसे चले आते हुए प्रकरण- के अनुरूप है । अतः पूर्वापरके प्रसङ्गको देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही अत्ता ( भोजन करनेवाला ) कहा गया है । सम्बन्ध—अब यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि इसके बादवाली श्रुति ( १ । ३ । १ ) में (कर्मफलरूप ) 'ऋत' को पीनेवाले छाया और धूपके सदृश

सूत्र ९-११ ] अध्याय १ २९

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सूत्र ९-११ ] अध्याय १ २९ दो भोक्ताओंका वर्णन है। यदि परमात्मा कर्मफलका भोक्ता नहीं है तो उक्त दो भोक्ता कौन-कौन-से हैं ? इसपर कहते हैं- गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ॥ १ । २ । ११ ॥ गुहाम्=हृदयरूप गुहामें; प्रविष्टौ=प्रविष्ट हुए दोनो; आत्मानौ=जीवात्मा और परमात्मा; हि=ही हैं; तद्दर्शनात्=क्योंकि ( दूसरी श्रुतिमें भी ) ऐसा ही देखा जाता है। व्याख्या-कठोपनिषद् ( १ । ३ । १ ) मे कहा है 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ।।' अर्थात् 'शुभ कर्मोंके फलरूप मनुष्य-शरीरके भीतर परब्रह्मके उत्तम निवास-स्थान ( हृदयाकाश ) मे बुद्धिरूप गुहामे छिपे हुए तथा 'सत्य' का पान करनेवाले दो हैं, वे दोनों छाया और धूपकी भाँति परस्पर विरुद्ध स्वभाववाले हैं। यह बात ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी कहते हैं। तथा जो तीन बार नाचिकेत अग्निका चयन करनेवाले पञ्चाग्नि-सम्पन्न गृहस्थ हैं, वे भी कहते हैं।' इस मन्त्रमे कहे हुए दोनो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही हैं। उन्हींका वर्णन छाया और धूपके रूपमें हुआ है। परमात्मा सर्वज्ञ, पूर्ण ज्ञानस्वरूप एवं स्वप्रकाश है, अतः उसका धूपके नामसे वर्णन किया गया है। और जीवात्मा अल्पज्ञ है। उसमे जो कुछ स्वल्प ज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है। जैसे छायामे जो थोड़ा प्रकाश होता है, वह धूपका ही अंग होता है। इसलिये जीवात्माको छायाके नाम- से कहा गया है। दूसरी श्रुतिमे भी जीवात्मा और परमात्माका एक साथ मनुष्य-शरीर- मे प्रविष्ट होना इस प्रकार कहा है-'सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि' ( छा० उ० ६ । ३ । २ ) अर्थात् 'उस देवता ( परमात्मा ) ने ईक्षण ( सङ्कल्प ) किया कि मै इस जीवात्माके सहित इन तेज आदि तीनों देवताओमे अर्थात् इनके कार्यरूप शरीरमे प्रविष्ट होकर नाम और रूपको प्रकट करूँ।' इससे भी यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त कठोपनिषद्‌के मन्त्रमे कहे हुए छाया और धूप सदृश दो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही हैं। यहाँ जो जीवात्माके साथ-साथ परमात्माको सत्य अर्थात् श्रेष्ठ कर्मोंके फलका भोगनेवाला बताया गया है, उसका यह भाव है कि परब्रह्म परमेश्वर ही समस्त देवता आदिके रूपमे प्रकारान्तरसे समस्त यज्ञ और तपरूप

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३० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ शुभ कर्मोंके भोक्ता हैं। * परन्तु उनका भोक्तापन सर्वथा निर्दोष है, 'इसलिये वे भोगते हुए भी अभोक्ता ही हैं। † सम्बन्ध-उपर्युक्त कथनकी सिद्धिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं- विशेषाणाच्च ॥ १ । २ । १२ ॥ विशेषाणात् = (आगेके मन्त्रोंमें) दोनोंके लिये अलग-अलग विशेषण दिये गये हैं, इसलिये; च = भी (उपर्युक्त दोनों भोक्ताओंको जीवात्मा और परमात्मा मानना ही ठीक है)। व्याख्या-इसी अध्यायके दूसरे मन्त्रमे उस परम अक्षर ब्रह्मको संसारसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये 'अभय पद' बताया गया है। तथा उसके बाद रथके दृष्टान्तमें जीवात्माको रथी और उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्तव्य परमधामके नामसे कहा गया है। इस प्रकार उन दोनोंके लिये पृथक्-पृथक् विशेषण होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ जिनको गुहामें प्रविष्ट बताया गया है, वे जीवात्मा और परमात्मा ही है। सम्बन्ध-यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि परमात्माकी उपलब्धि हृदयमें होती है, इसलिये उसे हृदयमें स्थित बताना तो ठीक है, परन्तु छान्दोग्योपनिषद् (४।१५।१) में ऐसा कहा हे कि 'यह जो नेत्रमे पुरुष दीखता है, यह आत्मा है, यही अमृत हे, यही अभय और ब्रह्म है।' अतः यहाँ नेत्रमें स्थित पुरुष कौन है ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है- अन्तर उपपत्तेः ॥ १ । २ । १३ ॥ अन्तरे = जो नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाला कहा गया है, वह ब्रह्म ही है; उपपत्तेः = क्योंकि ऐसा माननेसे ही पूर्वापर-प्रसङ्गकी सङ्गति बैठती है। व्याख्या-यह प्रसङ्ग छान्दोग्योपनिषद्मे चौथे अध्यायके दशम खण्डसे आरम्भ हुआ है और पन्द्रहवे खण्डमें समाप्त। प्रसङ्ग यह है कि उपकोशल नामका

  • भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ ( गीता ५ । २९ ) अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । ( गीता ९ । २३ ) † सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ ( गीता १३ । १४)

सूत्र १२-१३ ] अध्याय १ ३१

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सूत्र १२-१३ ] अध्याय १ ३१ ब्रह्मचारी सत्यकाम नामक ऋषिके आश्रममें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करता हुआ गुरुकी और अग्नियोंकी सेवा करता था । सेवा करते-करते उसे बारह वर्ष व्यतीत हो गये; परन्तु गुरुने उसे न तो उपदेश दिया और न स्नातक ही बनाया । इसके विपरीत उसीके साथ आश्रममे प्रविष्ट होनेवाले दूसरे शिष्योको स्नातक बनाकर घर भेज दिया । तब आचार्यसे उनकी पत्नीने कहा, 'भगवन् ! इस ब्रह्मचारीने अग्नियोकी अच्छी प्रकार सेवा की है । तपस्या भी इसने की ही है । अब इसे उपदेश देनेकी कृपा करे ।' परन्तु अपनी भार्याकी बातको अनसुनी करके सत्यकाम ऋषि उपकोशलको उपदेश दिये बिना ही बाहर चले गये । तब मनमे दुखी होकर उपकोशलने अनशन व्रत करनेका निश्चय कर लिया । यह देख आचार्य-पत्नीने पूछा —'ब्रह्मचारी ! तू भोजन क्यो नहीं करता है ?' उसने कहा, 'मनुष्यके मनमे बहुत-सी कामनाएँ रहती है । मेरे मनमे बड़ा दुःख है, इसलिये में भोजन नहीं करूँगा ।' तब अग्नियोने एकत्र होकर विचार किया कि 'इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है, अतः उचित है कि हम इसे उपदेश करे' ऐसा विचार करके अग्नियोने कहा—'प्राण ब्रह्म है, क ब्रह्म है, ख ब्रह्म है ।' उपकोशल बोला—'यह बात तो मै जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है । परन्तु 'क' और 'ख' को नहीं जानता ।' अग्नियोने कहा—'निस्सन्देह जो 'क' है, वही 'ख' है और जो 'ख' है, वही 'क' है तथा प्राण भी वही है ।' इस प्रकार उन्होने ब्रह्मको 'क' सुख-स्वरूप और 'ख' आकाशकी भाँति सूक्ष्म एव व्यापक बताया तथा वही प्राणरूपमे सबको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाला है; इस प्रकार सकेतसे ब्रह्मका परिचय कराया । उसके बाद गार्हपत्य अग्निने प्रकट होकर कहा—'सूर्यमे जो यह पुरुष दीखता है, वह मै हूँ; जो उपासक इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह पापोका नाश करके अच्छे लोकोका अधिकारी होता है तथा पूर्ण आयुष्मान् और उज्ज्वल जीवनसे युक्त होता है । उसका वश कभी नष्ट नहीं होता ।' इसके बाद 'अन्वाहार्यपचन' अग्निने प्रकट होकर कहा, 'चन्द्रमामे जो यह पुरुष दिखायी देता है, वह मै हूँ । जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर उपासना करता है, वह अच्छे लोकोका अधिकारी होता है ।' इत्यादि तत्पश्चात् आहवनीय अग्निने प्रकट होकर कहा, 'बिजलीमे जो यह पुरुष

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३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ दीखता है, वह मैं हूँ ।' इसको जानकर उपासना करनेका फल भी उन्होंने दूसरी अग्नियोंकी भाँति ही बतलाया । तदनन्तर सब अग्नियोंने एक साथ कहा, 'हे उपकोशल ! हमने तुमको हमारी विद्या ( अग्नि-विद्या ) और आत्म-विद्या दोनों ही बतलायी है । आचार्य तुमको इनका मार्ग दिखलावेंगे ।' इतनेमें ही उसके गुरु सत्यकाम आ गये । आचार्यने पूछा, 'सौम्य ! तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताकी भाँति चमकता है, तुझे किसने उपदेश दिया है ?' उपकोशलने अग्नियोंकी ओर संकेत किया । आचार्यने पूछा, 'इन्होंने तुझे क्या बतलाया है ?' तब उपकोशलने अग्नियोंसे सुनी हुई सब बातें बता दीं । तत्पश्चात् आचार्यने कहा, 'हे सौम्य ! इन्होंने तुझे केवल उत्तम लोकप्राप्तिके साधनका उपदेश दिया है, अब मैं तुझे वह उपदेश देता हूँ, जिसको जान लेनेवालेको पाप उसी प्रकार स्पर्श नहीं कर सकते, जैसे कमलके पत्तेको जल ।' उपकोशलने कहा, 'भगवन् ! बतलानेकी कृपा कीजिये ।' इसके उत्तरमें आचार्यने कहा, 'जो नेत्रमे यह पुरुष दिखलायी देता है, यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय और ब्रह्म है ।' उसके बाद उसीको 'संयद्वाम' 'वामनी' और 'भामनी' बतलाकर अन्तमें इन विद्याओका फल अर्चिर्मागसे ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है । इस प्रकरणको देखनेसे मालूम होता है कि आँखके भीतर दीखनेवाला पुरुष परब्रह्म ही है, जीवात्मा या प्रतिबिम्बके लिये यह कथन नहीं है; क्योकि ब्रह्मविद्या- के प्रसङ्गमे उसका वर्णन करके उसे आत्मा, अमृत, अभय और ब्रह्म कहा है । इन विशेषणोंकी उपपत्ति ब्रह्ममे ही लग सकती है, अन्य किसीमे नहीं । सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि यहाँ ब्रह्मको आँखमे दीखनेवाला पुरुष क्यों कहा गया ? वह किसी स्थानविशेषमें रहनेवाला थोड़े ही है ? इसपर कहते हैं— स्थानादिव्यपदेशाच्च ॥ १ । २ । १४ ॥ स्थानादिव्यपदेशात् = श्रुतिमे अनेक स्थलोंपर ब्रह्मके लिये स्थान आदिका निर्देश किया गया है, इसलिये; च = भी ( नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है ) । व्याख्या—श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मको समझानेके लिये उसके स्थान तथा नाम, रूप आदिका वर्णन किया गया है । जैसे अन्तर्यामि-ब्राह्मण ( बृह० उ० ३ । ७ । ३—२३ ) में ब्रह्मको पृथ्वी आदि अनेक स्थानोंमें स्थित बताया