भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 417 में से

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१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या-बृहदारण्यकोपनिषद्‌के अन्तर्यामिब्राह्मणमें कहा है कि- 'य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।' अर्थात् जो सूर्यमें रहनेवाला सूर्यका अन्तर्वर्ती है, जिसे सूर्य नहीं जानता, सूर्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर सूर्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ।' इस प्रकार वहाँ सूर्यन्तर्वर्ती पुरुषका सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भेद बताया गया है; इसलिये वह हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठातासे भिन्न परब्रह्म परमात्मा ही है । सम्बन्ध-यहाँतकके विवेचनसे यह सिद्ध किया गया कि जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका निमित्त और उपादान कारण परब्रह्म परमेश्वर ही है; जीवात्मा या जड प्रकृति नहीं। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि श्रुति (छा० उ० १ । ९ । १ ) में जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण आकाशको भी बताया गया है, फिर ब्रह्मका लक्षण निश्चित करते हुए यह कैसे कहा गया कि जिससे जगत्‌के जन्म आदि होते हैं, वह ब्रह्म है । इसपर कहते हैं- आकाशस्तल्लिङ्गात् ॥ १ । १ । २२ ॥ आकाशः=( वहाँ ) 'आकाश' शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है; तल्लिङ्गात्=क्योकि ( उस मन्त्रमे ) जो लक्षण बताये गये हैं, वे उस ब्रह्मके ही हैं। व्याख्या-छान्दोग्य ( १ । ९ । १ ) में इस प्रकार वर्णन आया है- 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशम्प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ।' अर्थात् 'ये समस्त भूत ( पञ्चतत्त्व और समस्त प्राणी ) निःसन्देह आकाशसे ही उत्पन्न होते है और आकाशमे ही विलीन होते हैं । आकाश ही इन सबसे श्रेष्ठ और बड़ा है । वही इन सबका परम आधार है ।' इसमे आकाशके लिये जो विशेषण आये है, वे भूताकाशमे सम्भव नहीं हैं; क्योंकि भूताकाश तो स्वयं भूतोंके समुदायमे आ जाता है । अतः उससे भूतसमुदायकी या प्राणियोंकी उत्पत्ति बतलाना सुसङ्गत नहीं है । उक्त लक्षण एकमात्र परब्रह्म परमात्मामे ही सङ्गत हो सकते है । वही सर्वश्रेष्ठ, सबसे बड़ा और सर्वाधार है; अन्य कोई नहीं । इसलिये यही सिद्ध होता है कि उस श्रुतिमे 'आकाश' नामसे परब्रह्म परमेश्वरको ही जगत्‌का कारण बताया गया है ।

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