बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in context| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११५५ | | :--- | :--- |
| वचनात् । कर्मणां चाविद्वद्विषयत्वमवोचाम । अविद्याविषये चोत्पत्त्यादिविकारसंस्कारार्थानि कर्माणीत्यत आत्मसंस्कारद्वारेणात्मज्ञानसाधनत्वमपि कर्मणामवोचाम यज्ञादिभिर्विविदिषन्तीति ।<br><br>अथैवं सति अविद्वद्विषयाणामाश्रमकर्मणां बलाबलविचारणायामात्मज्ञानोत्पादनं प्रति यमप्रधानानाममानित्वादीनां मानसानां च ध्यानज्ञानवैराग्यादीनां सन्निपत्योपकारकत्वम्, हिंसारागद्वेषादिबाहुल्याद् बहुक्लिष्टकर्मविमिश्रिता इतरे, इत्यतः पारिव्राज्यं मुमुक्षूणां प्रशंसन्ति—<br>“त्याग एव हि सर्वेषामुक्तानामपि कर्मणाम् ।<br>वैराग्यं पुनरेतस्य मोक्षस्य परमोऽवधिः ॥”<br>“किं ते धनेन किमु बन्धुभिस्ते किं ते दारैर्ब्राह्मण यो मरिष्यसि ।<br>आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टं | होता है । कर्म अज्ञानियोंके लिये हैं—यह भी हम कह चुके हैं । अविद्याके क्षेत्रमें भी उत्पत्ति आदि विकार और संस्काररूप प्रयोजनके लिये कर्म हैं, इसलिये हमने 'यज्ञादिके द्वारा आत्माको जाननेकी इच्छा करते हैं' ऐसा कहकर चित्तके संस्कारद्वारा कर्मोंका आत्मज्ञानमें साधन होना भी बतलाया है ।<br><br>ऐसी स्थितिमें अज्ञानियोंसे सम्बद्ध आश्रमकर्मोंके बलाबलका विचार करनेपर यह सिद्ध होता है कि अमानित्वादि यमप्रधान और ध्यान-ज्ञान-वैराग्यादि मानस कर्म आत्मज्ञानकी उत्पत्तिमें सन्निपत्योपकारक (साक्षात् उपयोगी) हैं । अन्य कर्म हिंसा एवं राग-द्वेष आदिकी बहुलताके कारण बहुत-से क्लिष्ट कर्मोंसे मिले हुए हैं; इसलिये मुमुक्षुके लिये पारिव्राज्य (संन्यास) की ही प्रशंसा करते हैं; यथा—<br>“सम्पूर्ण उक्त कर्मोंका भी त्याग ही करना चाहिये । इस मोक्षकी परम अवधि वैराग्य ही है ।” “हे ब्राह्मण ! जो तू एक दिन मरेगा ही, तो तेरे लिये धनसे, बन्धुओंसे अथवा स्त्रियोंसे क्या प्रयोजन है ? तू अपनी बुद्धिरूपी गुहामें प्रविष्ट आत्माका अनुसंधान |