बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1168, कुल 1402 में से
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| ११५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| संस्कृत (भाष्य) | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| ष्टदर्शनात् । तस्माद् यावदात्मज्ञानविधेराभिमुख्यं तावदेव कर्मविधयः । तस्मान्नात्मज्ञानसहभावित्वं कर्मणामित्यतः सिद्धमात्मज्ञानमेवामृतत्वसाधनम् ‘एतावदरे खल्वमृतत्वम्’ इति, कर्मनिरपेक्षत्वाज्ज्ञानस्य । अतो विदुषस्तावत् पारिव्राज्यं सिद्धं सम्प्रदानादिकर्मकारकजात्यादिशून्याविक्रियब्रह्मात्मदृढप्रतिपत्तिमात्रेण वचनमन्तरेणाप्युक्तन्यायतः । | देखा जाता है। अतः जबतक पुरुष आत्मज्ञानसम्बन्धी विधिके अभिमुख न हो जाय तभीतक कर्मविधियाँ हैं। इसलिये कर्मोंका आत्मज्ञानके साथ रहना सम्भव नहीं है, अतः 'हे मैत्रेयी ! निश्चय यही अमृतत्व है' इस प्रमाणसे सिद्ध होता है कि आत्मज्ञान ही अमृतत्वका साधन है, क्योंकि ज्ञानको कर्मकी अपेक्षा नहीं है। इसलिये कोई प्रमाणभूत वचन न होनेपर भी उक्त न्यायसे सम्प्रदानादि कर्मोंके कारक एवं जाति आदिसे शून्य अविकारी ब्रह्ममें ही सुदृढ आत्मभावके बोधमात्रसे ही विद्वान्के लिये तो संन्यास सिद्ध हो ही जाता है। |
| तथा च व्याख्यातमेतत् ‘येषां नोऽयमात्मायं लोकः’ इति हेतुवचनेन पूर्वे विद्वांसः प्रजामकामयमाना व्युत्तिष्ठन्तीति पारिव्राज्यं विदुषामात्मलोकावबोधादेव । | इसी प्रकार 'जिन हमको यह आत्मलोक अभीष्ट है' इस हेतुवाक्यके द्वारा यह भी व्याख्या कर ही दी गयी है कि पूर्ववर्ती विद्वान् प्रजा आदिकी इच्छा न करके गृहत्याग कर देते थे; अतः आत्मलोकके ज्ञानमात्रसे विद्वानोंके लिये पारिव्राज्य (संन्यास) सिद्ध हो जाता है। |
| तथा च विविदिषोरपि सिद्धं पारिव्राज्यम्, “एतमेवात्मानं लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति” इति | ऐसे ही “इस आत्मलोककी ही इच्छा रखनेवाले परिव्राजक (संन्यासी) होते हैं” इस वचनसे जिज्ञासुके लिये भी पारिव्राज्य सिद्ध |