बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 348 of 1402
Read in context| ३४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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आत्माके लिये तीन अन्न और उनका आध्यात्मिक विवेचन
| पाङ्क्तस्य कर्मणः फलभूतानि यानि त्रीण्यन्नान्युपक्षिप्तानि तानि कार्यत्वाद्विस्तीर्णविषयत्वाच्च पूर्वेभ्योऽन्नेभ्यः पृथगुत्कृष्टानि, तेषां व्याख्यानार्थ उत्तरो ग्रन्थ आ ब्राह्मणपरिसमाप्तेः । | पाङ्क्तकर्मके फलभूत जिन तीन अन्नोंका ऊपर उल्लेख किया गया है वे कार्य तथा विस्तीर्ण विषयसे सम्बद्ध होनेके कारण पूर्वोक्त अन्नोंसे अलग और उनकी अपेक्षा उत्कृष्ट हैं। उनकी व्याख्याके लिये इस ब्राह्मणकी समाप्तिपर्यन्त आगेका ग्रन्थ है— |
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त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुतान्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषमिति मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति । कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो मनसा विजानाति यः कश्च शब्दो वागेव सा । एषा ह्यन्तमायत्तैषा हि न प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानोऽन इत्येतत्सर्वं प्राण एवैतन्मयो वा अयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः ॥ ३ ॥
उसने तीन अन्न अपने लिये किये अर्थात् मन, वाणी और प्राण इन्हें उसने अपने लिये किया। 'मेरा मन अन्यत्र था, इसलिये मैंने नहीं देखा, मेरा मन अन्यत्र था, इसलिये मैंने नहीं सुना' [ ऐसा जो मनुष्य कहता है, इससे निश्चय होता है कि ] वह मनसे ही देखता है और मनसे ही सुनता है। काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति ( धारणशक्ति ), अधृति, लज्जा, बुद्धि, भय—ये सब मन ही हैं। इसीसे पीछेसे स्पर्श किये जानेपर मनुष्य मनसे जान लेता है। जो कुछ भी शब्द है, वह वाक् ही है;