भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 349

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४३


क्योंकि यह अभिधेयके पर्यवसानमें अनुगत है, इसलिये प्रकाश्य नहीं है। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान और अन—ये सब प्राण ही हैं। यह आत्मा (शरीर) एतन्मय अर्थात् वाङ्मय, मनोमय और प्राणमय ही है ॥३॥


[मनसोऽस्तित्व-निरूपणम्]
त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति कोऽस्यार्थ इत्युच्यते—मनोवाक्प्राणा एतानि त्रीण्यन्नानि, तानि मनो वाचं प्राणं चात्मने आत्मार्थमकुरुत—कृतवान् सृष्ट्वाऽऽदौ पिता।‘त्रीण्यात्मनेऽकुरुत’ इस मन्त्रका क्या अर्थ है, सो बतलाया जाता है—मन, वाक् और प्राण ये तीन अन्न हैं; उन मन, प्राण और वाक्‌को पिताने प्रथम उत्पन्न कर उन्हें अपने लिये नियत किया।
तेषां मनसोऽस्तित्वं स्वरूपं च प्रति संशय इत्यत आह—अस्ति तावन्मनः श्रोत्रादिबाह्यकरणव्यतिरिक्तम्, यत एवं प्रसिद्धम्--बाह्यकरणविषयात्मसम्बन्धे सत्यप्यभिमुखोभूतं विषयं न गृह्णाति, 'किं दृष्टवानसीदं रूपम् ?' इत्युक्तो वदति—'अन्यत्र मे गतं मन आसीत्सोऽहमन्यत्रमना आसं नादर्शम्'। तथा 'इदं श्रुतवानसि मदीयं वचः?' इत्युक्तः 'अन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषं न श्रुतवानस्मि' इति।उनमें मनके अस्तित्व और स्वरूपके विषयमें सन्देह है, इसलिये श्रुति कहती है—श्रोत्रादि बाह्य इन्द्रियोंसे भिन्न मन भी है; क्योंकि यह बात प्रसिद्ध है कि [कभी-कभी] पुरुष बाह्य इन्द्रिय, विषय और आत्माका सम्बन्ध रहते हुए भी अपने सामनेके विषयको ग्रहण नहीं करता, तथा यह पूछनेपर कि ‘क्या तूने यह रूप देखा है?’ कहता है—‘मेरा मन अन्यत्र चला गया था, अतः मैं अन्यत्रमना था, इसलिये नहीं देखा।’ तथा यह पूछनेपर कि ‘क्या तूने मेरा यह वचन सुना था?’ कहता है—‘मैं अन्यत्रमना था, इसलिये नहीं सुना।’
तस्माद् यस्यासन्निधौ रूपादिग्रहणसमर्थस्यापि सतश्चक्षुरादेःअतः जिसकी सन्निधि न होनेपर, रूपादिके ग्रहणमें समर्थ नेत्र आदिके