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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 395 of 1402

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Page 395

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३८९


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पुरुषस्य, तं देवा॑स्तं धर्मं देवाश्च-जाता है, उस धर्मको देवताओंने किया—धारण किया; अर्थात्
क्रिरे धृतवन्तो वागादयोऽग्न्या-वागादि इन्द्रियोंने और अग्न्यादि
दयश्च प्राणव्रतं वायुव्रतं च पुरादेवताओंने पूर्वकालमें विचार कर क्रमशः प्राणव्रत और वायुव्रत धारण
विचार्य । स एवाद्येदानीं श्वोऽपिकिया। वही आज इस समय अनु-
भविष्यत्यपि कालेऽनुवर्त्यतेऽनु-वर्तित होता है और कल-भविष्य-कालमें भी देवताओंद्वारा उसीका
वर्तिष्यते च देवैरित्यभिप्रायः ।अनुवर्तन किया जायगा—ऐसा इसका अभिप्राय है।
तत्रैमं मन्त्रं संक्षेपतो व्याचष्टयहाँ ब्राह्मण संक्षेपसे इस मन्त्र-की व्याख्या करता है—प्राणसे ही
ब्राह्मणम्—प्राणाद्वा एष सूर्ययह सूर्य उदित होता है—और
उदेति प्राणेऽस्तमेति । तं देवाश्च-प्राणमें ही अस्त हो जाता है। 'तं देवाश्चक्रिरे धर्मं स एवाद्य स उ श्वः'
क्रिरे धर्मं स एवाद्य स उ श्वइस उत्तरार्धका क्या अर्थ है ? सो
इत्यस्य कोऽर्थः ? इत्युच्यते-यद्वैबतलाया जाता है—इन वागादि
एते व्रतमकुर्हि अमुष्मिन्कालेऔर अग्न्यादिने उस समय क्रमशः जिन प्राणव्रत और वायुव्रतको धारण
वागादयोऽग्न्यादयश्च प्राणव्रतंकिया था उन्हींको वे आज भी करते
वायुव्रतं वाध्रियन्त, तदेवाद्यापिहैं, उसीका अनुवर्तन वे करते हैं और उसीका अनुवर्तन करेंगे। उनके
कुर्वन्त्यनुवर्तन्तेऽनुवर्तिष्यन्ते च।द्वारा यह व्रत अखण्डित ही है। किन्तु
व्रतं तैरभग्नमेव । यत्तु वागादि-जो वागादि और अग्न्यादिका व्रत
व्रतमग्न्यादिव्रतं च तद्भग्नमेव,है वह तो खण्डित ही है, क्योंकि सायंकाल और सुषुप्तिके समय
तेषामस्तमनकाले स्वापकाले चउनका क्रमशः वायु और प्राणमें
वायौ प्राणे च निम्लुक्तिदर्शनात् ।अस्त होना देखा जाता है।