बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 396 of 1402
Read in context| ३९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| अथैतदन्यत्रोक्तम्—“यदा वै पुरुषः स्वपिति प्राणं तर्हि वागप्येति प्राणं मनः प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं यदा प्रबुध्यते प्राणादेवाधि पुनर्जायन्त इत्यध्यात्ममथाधिदैवतं यदा वा अग्निरनुगच्छति वायुं तर्ह्यन्वेति तस्मादेनमुदवासीदित्याहुर्वायुं ह्यन्वेति यदादित्योऽस्तमेति वायुं तर्हि प्रविशति वायुं चन्द्रमा वायौ दिशः प्रतिष्ठिता वायोरेवाधि पुनर्जायन्ते” इति। | यही बात एक अन्य स्थानपर भी कही है—“जिस समय पुरुष सोता है, उस समय वाक् प्राणमें लीन हो जाती है तथा प्राणमें ही मन, प्राणमें ही चक्षु और प्राणमें ही श्रोत्र लीन हो जाते हैं जिस समय वह उठता है उस समय प्राणसे ही ये पुनः उत्पन्न हो जाते हैं। यह अध्यात्मदृष्टि है, अब अधिदैवदृष्टि बतलायी जाती है—जब अग्नि अनुगमन करने (शान्त होने) लगता है, उस समय वह वायुके अधीन ही शान्त होता है, इसीसे ‘यह इसमें अनुगत (अस्त) हो गया’ ऐसा कहते हैं। जिस समय सूर्य अस्त होता है तो वह वायुमें ही अनुगमन—प्रवेश कर जाता है; तथा वायुमें ही चन्द्रमा और वायुमें ही दिशाएँ प्रतिष्ठित होती हैं एवं वायुसे ही वे पुनः उत्पन्न होती हैं” इत्यादि। | | यस्माद् एतदेव व्रतं वागादिष्वग्न्यादिषु चानुगतं यदेतद्वायोश्च प्राणस्य च परिस्पन्दात्मकत्वं सर्वैर्देवैरनुवर्त्यमानं व्रतम्-तस्मादन्योऽप्येकमेव व्रतं चरेत्। किं तत्? प्राण्यात्प्राणनव्यापारं कुर्यादपान्यादपाननव्यापारं च; | क्योंकि वागादि और अग्न्यादिमें यही व्रत अनुगत है, अर्थात् वायु और प्राणका जो परिस्पन्दरूप धर्म है, वही समस्त देवताओंद्वारा अनुवर्तित होनेवाला व्रत है, इसलिये अन्य किसीको भी एक ही व्रतका आचरण करना चाहिये। वह एक व्रत क्या है? ‘प्राण्यात्’—प्राणनव्यापार करे और ‘अपान्यात्’—अपानन व्यापार |