BharatKosha
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 397 of 1402

Read in context
Page 397

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९१


संस्कृतहिन्दी
न हि प्राणापानव्यापारस्य प्राणनापाननलक्षणस्योपरमोऽस्ति । तस्मात्तदेवैकं व्रतं चरेद्धित्वेन्द्रियान्तरव्यापारं नेन्मा मां पाप्मा मृत्युः श्रमरूप्याप्नुवदाप्नुयात् । नेच्छब्दः परिभये--'यद्यहमस्माद् व्रतात्प्रच्युतः स्याम्, ग्रस्त एवाहं मृत्युना' इत्येवं त्रस्तो धारयेत्प्राणव्रतमित्यभिप्रायः ।करे, क्योंकि प्राण और अपानके व्यापार प्राणन और अपाननकी कभी निवृत्ति नहीं होती । अतः इस भयसे कि मुझे कहीं श्रमरूपी पापात्मा मृत्यु व्याप्त न कर ले, अन्य इन्द्रियोंके व्यापारको छोड़कर एक इसी व्रतका आचरण करे । यहाँ 'नेत्' शब्द परिभयके अर्थमें है । अभिप्राय यह है कि 'यदि मैं इस व्रतसे च्युत हो जाऊँगा तो अवश्य मृत्युसे ग्रस्त हो जाऊँगा' इस प्रकार डरता हुआ प्राणव्रतको धारण करे ।
यदि कदाचिद् उ चरेत्प्रारभेत प्राणव्रतम्, समापिपयिषेत्समापयितुमिच्छेत्;यदि ह्यस्माद् व्रतादुपरमेत्प्राणः परिभूतः स्याद्देवाश्च; तस्मात्समापयेदेव । तेन उ तेनानेन व्रतेन प्राणात्मप्रतिपत्त्या सर्वभूतेषु—वागादयोऽग्न्यादयश्च मदात्मका एव, अहं प्राण आत्मा सर्वपरिस्पन्दकृत्—एवं तेनानेन व्रतधारणेन एतस्या एव प्राणदेवतायाः सायुज्यं सयुग्भावमेकात्मत्वं सलोकतां समानलोकतां वा एकस्थानत्वम्—विज्ञान-यदि कभी प्राणव्रतका आचरण-आरम्भ करे तो उसे समाप्त करनेकी इच्छा रखे, क्योंकि यदि इस व्रतसे [ बीचमें ही ] हट जायगा तो प्राण और देवताओंका पराभव होगा; इसलिये इसे समाप्त करना ही चाहिये । 'तेन उ' अर्थात् उस इस प्राणात्मत्वकी प्राप्तिरूप व्रतसे समस्त भूतोंमें वागादि और अग्न्यादि मेरे ही स्वरूप हैं, मैं प्राणरूप आत्मा सबका परिस्पन्दन करनेवाला हूँ' इस प्रकार उस इस व्रतको धारण करनेसे इस प्राणदेवताके ही सायुज्य—संयोग अर्थात् एकरूपताको तथा विज्ञानकी मन्दताकी अपेक्षासे सलोकता—समानलोकता अर्थात् समानस्थानत्वको