बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 398 of 1402
Read in context| ३९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| मान्द्यापेक्षमेतत्—जयति प्राप्नोतीति ॥ २३ ॥ | जीतता अर्थात् उसे प्राप्त कर लेता है ॥ २३ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये पञ्चमं सप्तान्नब्राह्मणम्॥५॥
षष्ठ ब्राह्मण
पूर्वोक्त अविद्याकार्यका उपसंहार—नामसामान्यभूता वाक्
| यदेतदविद्याविषयत्वेन प्रस्तुतं साध्यसाधनलक्षणं व्याकृतं जगत् प्राणात्मप्राप्त्यन्तोत्कर्षवदपि फलम्, या चैतस्य व्याकरणात्प्रागवस्थाऽव्याकृतशब्दवाच्या वृक्षबीजवत्सर्वमेतत्। | यह जो साध्य-साधनरूप व्याकृत जगत् और प्राणात्मप्राप्तिपर्यन्त उत्कर्षवाला उसका फल भी अविद्याके विषयरूपसे आरम्भ किया गया है तथा वृक्षके बीजके समान जो 'अव्याकृत' शब्दसे कही जानेवाली इसके व्याकरण (व्याप्त होने) से पूर्वकी अवस्था है, यह सब— |
त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म तेषां नाम्नां वागित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्ति । एतदेषाꣳ सामैतद्धि सर्वैर्नामभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि नामानि बिभर्ति ॥ १ ॥
यह नाम, रूप और कर्म तीनका समुदाय है। उन नामोंकी 'वाक्' यह उक्थ (कारण) है, क्योंकि सारे नाम इसीसे उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है। यही सब नामोंमें समान है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यह समस्त नामोंको धारण करती है ॥ १ ॥
| त्रयम्; किं तत्त्रयम्? इत्युच्यते। | त्रय है। वह त्रय क्या है? सो बतलाया जाता है—नाम, रूप और | | नाम रूपं कर्म चेत्यनात्मैव। नात्मा | कर्म-यह अनात्मा ही वह त्रय है। |