बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 399 of 1402
Read in context| ब्राह्मण ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३९३ |
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| यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म। तस्मादस्माद्विरज्येतेत्येवमर्थस्त्रयं वा इत्याद्यारम्भः। न ह्यस्मादनात्मनोऽव्यावृत्तचित्तस्य आत्मानमेव लोकमहं ब्रह्मास्मीत्युपासितुं बुद्धिः प्रवर्तते। बाह्यप्रत्यगात्मप्रवृत्त्योर्विरोधात्। तथा च काठके—<br>“पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्।<br>कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्” (क० उ० २।१।१) इत्यादि। | जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है वह आत्मा नहीं। अतः [मुमुक्षु] इससे विरक्त हो जाय—इसलिये 'त्रयं वा' इत्यादि मन्त्रका आरम्भ किया गया है। क्योंकि इस अनात्मासे जिसका चित्त नहीं हटा है, उसकी बुद्धि 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार आत्मलोककी ही उपासना करनेके लिये प्रवृत्त नहीं होती। कारण बाह्य प्रवृत्ति और प्रत्यगात्मविषयिणी वृत्तिमें परस्पर विरोध है। ऐसा ही कठोपनिषद्में भी कहा है—“स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है, इसलिये पुरुष बाह्य विषयोंको ही देखता है, अन्तरात्माको नहीं। अमृतत्वकी इच्छा करनेवाले किसी-किसी धीर पुरुषने ही इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर अन्तरात्माको देखा है” इत्यादि। | | कथं पुनरस्य व्याकृताव्याकृतस्य क्रियाकारकफलात्मनः संसारस्य नामरूपकर्मात्मकतैव? न पुनरात्मत्वम्? इत्येतत्सम्भावयितुं शक्यत इति; अत्रोच्यते—<br>तेषां नाम्नां यथोपन्यस्तानां वागिति शब्दसामान्यमुच्यते। | किंतु इस व्याकृत और अव्याकृत क्रिया-कारक-फलरूप संसारकी नाम-रूप-कर्मात्मकता ही क्यों है? आत्मस्वरूपता क्यों नहीं है? ऐसी सम्भावना की जा सकती है, अतः इस विषयमें कहते हैं—ऊपर जिनका उल्लेख किया गया है, उन नामोंका वाक् यह शब्दसामान्य कहा जाता |