बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 411 of 1402
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ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४०५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| ऐतिह्यार्थ आख्यायिकायाम्, अनूचानः अनुवचनसमर्थो वक्ता वाग्मी; गार्ग्यो गोत्रतः, आस बभूव क्वचित्कालविशेषे । | था, वह अनूचान—अनुवचनमें समर्थ-बोलनेवाला अर्थात् बड़ा वाचाल था। 'ह' शब्द आख्यायिका-में ऐतिह्य (इतिहासप्राप्त अर्थ) की सूचना देनेके लिये है। |
| स होवाचाजातशत्रुमजातशत्रुनामानं काश्यं काशिराजमभिगम्य—ब्रह्म ते ब्रवाणीति ब्रह्म ते तुभ्यं ब्रवाणि कथयानि। स एवमुक्तोऽजातशत्रुरुवाच—सहस्रं गवां दद्म एतस्यां वाचि—यां मां प्रत्यवोचो ब्रह्म ते ब्रवाणीति, तावन्मात्रमेव गोसहस्रप्रदाने निमित्तमित्यभिप्रायः। | उसने अजातशत्रुसे—अजातशत्रुनामक काश्य—काशिराजसे, उसके पास जाकर कहा—'ब्रह्म ते ब्रवाणि—मैं तुम्हारे प्रति ब्रह्मका निरूपण करूँ।' इस प्रकार कहे जानेपर अजातशत्रुने कहा, आपने जो कहा है कि 'मैं तुम्हारे प्रति ब्रह्मका निरूपण करूँ' सो आपके इस कथनके लिये "मैं सहस्र गौएँ देता हूँ।' अभिप्राय यह है कि अजातशत्रुके सहस्र गौएँ देनेमें केवल इतना ही निमित्त था। |
| साक्षाद्ब्रह्मकथनमेव निमित्तं कस्मान्नापेक्ष्यते सहस्रदाने ? ब्रह्म ते ब्रवाणीतीयमेव तु वाङ्निमित्तमपेक्ष्यते ? इत्युच्यते; यतः श्रुतिरेव राज्ञोऽभिप्रायमाह—जनको दाता जनकः श्रोतेति चैतस्मिन्वाक्यद्वये पदद्वयमभ्यस्यते जनको जनक इति। वैशब्दः | सहस्र गौएँ देनेमें साक्षात् ब्रह्म-निरूपणकी ही अपेक्षा क्यों नहीं थी? केवल 'ब्रह्म ते ब्रवाणि' इस वाक्यकी ही अपेक्षा क्यों थी? सो बतलाया जाता है; क्योंकि राजाके अभिप्रायको श्रुति ही बतला रही है—'जनकः, जनकः' इन दो पदोंकी आवृत्ति 'जनक दाता है, जनक श्रोता है' इन दो वाक्योंके अर्थमें |