बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 412 of 1402
Read in context| ४०६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| प्रसिद्धावद्योतनार्थः; जनको दित्सुर्जनकः शुश्रूषुरिति ब्रह्म शुश्रूषवो विवक्तवः प्रतिजिघृक्षवश्च जना धावन्त्यभिगच्छन्ति। तस्मात्तत्सर्वं मय्यपि सम्भावितवानसीति ॥ १ ॥ | हुई है। 'वै' शब्द प्रसिद्धिको सूचित करनेके लिये है। 'जनक देनेकी इच्छावाला है, जनक श्रवणकी इच्छावाला है' यह समझकर 'ब्रह्म' तत्त्वको सुनने और कहनेकी इच्छावाले तथा प्रतिग्रहकी इच्छावाले लोग दौड़ते—उसीके पास जाते हैं। अतः [ इस वाक्यसे ] आपने वह सब मेरे लिये भी सम्भव कर दिया है, इसीसे [ इस वचनके लिये मैं सहस्र गौएँ देता हूँ ] ॥ १ ॥ |
गार्ग्यद्वारा आदित्यका ब्रह्मरूपसे प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान
| एवं राजानं शुश्रूषुमभिमुखीभूतम्— | इस प्रकार श्रवणके इच्छुक और अपने प्रति अभिमुख हुए राजासे— |
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स होवाच गार्ग्यो य एवासावादित्ये पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजेति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति ॥ २ ॥
उस गार्ग्यने कहा, 'यह जो आदित्यमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा—नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। यह सबका अतिक्रमण करके स्थित है, समस्त भूतोंका मस्तक है और राजा (दीप्तिमान्) है—इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ। जो पुरुष इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह सबका अतिक्रमण करके स्थित, समस्त भूतोंका मस्तक और राजा होता है ॥ २ ॥