बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 413 of 1402
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| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४०७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
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| स होवाच गार्ग्यः— य एव असौ आदित्ये चक्षुषि चैकोऽभिमानी चक्षुर्द्वारेणेह हृदि प्रविष्टः 'अहं भोक्ता कर्ता च' इत्यवस्थितः, एतमेवाहं ब्रह्म पश्यामि, अस्मिन्कार्यकरणसङ्घाते उपासे। तस्मात्तमहं पुरुषं ब्रह्म तुभ्यं ब्रवीम्युपास्स्वेति। | उस गार्ग्यने कहा—'यह जो आदित्यमें और नेत्रमें उनका एक ही अभिमानी चक्षुके द्वारा यहाँ हृदयमें प्रविष्ट होकर 'मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ' इस प्रकार स्थित है, उसीको मैं ब्रह्म समझता हूँ, इस देहेन्द्रिय-संघातमें मैं उसीकी उपासना करता हूँ। अतः उस पुरुषको ही मैं तुम्हें ब्रह्मरूपसे बतलाता हूँ; तुम उसीकी उपासना करो।' |
| स एवमुक्तः प्रत्युवाच अजातशत्रुः 'मा मा' इति हस्तेन विनिवारयन्— एतस्मिन्ब्रह्मणि विज्ञेये मा संवदिष्ठाः; मा मेत्यावाधनार्थं द्विर्वचनम्। एवं समाने विज्ञानविषये आवयोरसमानविज्ञानवत इव दर्शयता बाधिताः स्याम, अतो मा संवदिष्ठाः—मा संवादं कार्षीरस्मिन्ब्रह्मणि। अन्यच्चेज्जानासि, तद्ब्रह्म वक्तुमर्हसि, न तु यन्मया ज्ञायत एव। | इस प्रकार कहे जानेपर उस अजातशत्रुने 'नहीं, नहीं' इस प्रकार हाथसे मना करते हुए कहा—'इस विज्ञेय ब्रह्मके विषयमें चर्चा मत करो। 'मा मा' यह द्विरुक्ति सब प्रकार रोकनेके लिये है; क्योंकि इस प्रकार हम दोनोंके विज्ञानका विषय समान होनेपर भी हमें अविज्ञानवान्-सा देखनेवाले तुमसे हम बाधित हो जायँगे, इसलिये इस ब्रह्मके विषयमें संवाद मत करो। यदि तुम कोई अन्य ब्रह्म जानते हो तो उसीका निरूपण करो, जिसे मैं जानता ही हूँ, उसका नहीं। |
| अथ चेन्मन्यसे— जानीषे त्वं ब्रह्ममात्रं न तु तद्विशेषणोपासनफलानीति—तन्न मन्तव्यम्, यतः | यदि तुम्हारा ऐसा विचार हो कि तुम तो केवल ब्रह्ममात्रको जानते हो, उसके विशेषणोंकी उपासनाके फलको तो नहीं जानते, सो तुम्हें ऐसा नहीं समझना चाहिये, क्योंकि |