बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 575 of 1402
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५६७
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| विलीयमानमनुविलीयेत; यत्तद्भौमतैजससम्पर्कात्काठिन्यप्राप्तिः खिल्यस्य स्वयोनिसम्पर्कादपगच्छति तदुदकस्य विलयनम्, तदनु सैन्धवखिल्यो विलीयत इत्युच्यते। तदेतदाह उदकमेवानुविलीयेतेति। | उसीमें लीन हो जाता है। पार्थिव तैजसका सम्पर्क होनेसे जो उस डलेको कठिनताकी प्राप्ति हुई थी वह अपने कारणका संयोग होनेपर निवृत्त हो जाती है, यही जलका घुलना है, उसके साथ ही नमकका डला भी घुल गया—ऐसा कहा जाता है। इसीसे यह कहा गया है कि वह जलके साथ ही लीन हो जाता है। |
| न ह नैव अस्य खिल्यस्योद्ग्रहणायोद्धृत्य पूर्ववद् ग्रहणाय ग्रहीतुं नैव समर्थः कश्चित्स्यात्सुनिपुणोऽपि। इवशब्दोऽनर्थकः। ग्रहणाय नैव समर्थः; कस्मात्? यतो यतो यस्माद्यस्माद्देशात्तदुदकमाददीत गृहीत्वा स्वादयेत्, लवणास्वादमेव तदुदकं न तु खिल्यभावः। | इस डलेके उद्ग्रहण अर्थात् पूर्ववत् निकालकर ग्रहण करनेके लिये कोई अत्यन्त निपुण पुरुष भी समर्थ नहीं होता। यहाँ 'इव' शब्द अर्थहीन है। उसे ग्रहण करनेके लिये समर्थ हो ही नहीं सकता। क्यों नहीं हो सकता? क्योंकि जिस-जिस जगहसे वह उस जलको ग्रहण करता है अर्थात् ग्रहण करके चखता है, वह जल लवणके ही स्वादवाला होता है, उसमें डलापन नहीं रहता। |
| यथायं दृष्टान्तः, एवमेव वा अरे मैत्रेयीदं परमात्माख्यं महद् भूतम्—यस्मान्महतो भूतादविद्यया परिच्छिन्ना सती कार्यकारणोपाधिसम्बन्धात्खिल्यभाव- | जैसा कि यह दृष्टान्त है इसी प्रकार हे मैत्रेयि! यह परमात्मा नामका महद्भूत है, जिस महद्भूतसे तू अविद्यासे परिच्छिन्न होकर देहेन्द्रियरूप उपाधिके सम्बन्धसे खिल्यभावको प्राप्त हो गयी है तथा |