बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 574, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें५६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २
स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानु-
विलीयेत न हास्योद्ग्रहणायेव स्यात् । यतो यतस्त्वा-
ददीत लवणमेवैवं वा अर इदं महद्भूतमनन्तमपारं
विज्ञानघन एव । एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्ये-
वानु विनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति
होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥
इसमें यह दृष्टान्त है—जिस प्रकार जलमें डाला हुआ नमकका डला जलमें ही लीन हो जाता है। उसे जलसे निकालनेके लिये कोई समर्थ नहीं होता। जहाँ-जहाँसे भी जल लिया जाय वह नमकीन ही जान पड़ता है, हे मैत्रेयि! उसी प्रकार यह महद्भूत अनन्त, अपार और विज्ञान-घन ही है। यह इन [ सत्यशब्दवाच्य ] भूतोंसे प्रकट होकर उन्हींके साथ नाशको प्राप्त हो जाता है; देहेन्द्रियभावसे मुक्त होनेपर इसकी कोई विशेष संज्ञा नहीं रहती। हे मैत्रेयि! ऐसा मैं तुझसे कहता हूँ—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ॥ १२ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-व्याख्या |
|---|---|
| तत्र दृष्टान्त उपादीयते—स यथेति। सैन्धवखिल्यः—सिन्धोर्विकारः सैन्धवः, सिन्धुशब्देनोदकमभिधीयते, स्यन्दनात्सिन्धुरुदकम्, तद्विकारस्तत्र भवो वा सैन्धवः सैन्धवश्चासौ खिल्यश्चेति सैन्धवखिल्यः, खिल एव खिल्यः स्वार्थे यत्प्रत्ययः; उदके सिन्धौ स्वयोनौ प्रास्तः प्रक्षिप्तः, उदकमेव | यहाँ यह दृष्टान्त दिया जाता है—'स यथा' इत्यादि। सैन्धव-खिल्य—सिन्धुके विकारका नाम सैन्धव है, 'सिन्धु' शब्दसे जल कहा जाता है। स्यन्दन करने (बहने) के कारण जल सिन्धु है, उसका विकार अथवा उससे उत्पन्न होनेवाला सैन्धव कहलाता है। जो सैन्धव हो और खिल्य (डला) हो, उसे सैन्धवखिल्य कहते हैं। खिल ही खिल्य है। यहाँ स्वार्थमें यत् प्रत्यय है। वह अपने कारणभूत सिन्धु यानी जलमें डाले जानेपर जलके साथ घुलता हुआ |