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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 189 of 978

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Page 189

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ १८५


एकविंशत्यादित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥

इक्कीस अक्षरोंद्वारा साधक आदित्यलोकं प्राप्त करता है, क्योंकि इस लोकसे वह आदित्य निश्चय ही इक्कीसवाँ है । बाईसवें अक्षरद्वारा वह आदित्यसे परे उस दुःखहीन एवं शोकरहित लोकको जीत लेता है ॥ ५ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
तत्रैकविंशत्यक्षरसंख्ययादित्यमाप्नोति मृत्युम् । यस्मादेकविंश इतोऽस्माल्लोकादसावादित्यः संख्यया । "द्वादश मासाः पञ्चर्तवस्त्रय इमे लोका असावादित्य एक विँशः" इति श्रुतेः । अतिशिष्टेन द्वाविंशेनाक्षरेण परं मृत्योरादित्याज्जयत्याप्नोतीत्यर्थः । यच्च तदादित्यात्परं किं तत् ? नाकं कमिति सुखं तस्य प्रतिषेधोऽकं तन्न भवतीति नाकं कमेवेत्यर्थः, अमृत्युविषयत्वात् । विशोकं च तद्विगतशोकं मानसदुःखरहितमित्यर्थः । तदाप्नोतीति ॥ ५ ॥वहाँ वह इक्कीस अक्षर-संख्याके द्वारा तो आदित्यलोकरूप मृत्युको प्राप्त करता है, क्योंकि इस लोककी अपेक्षा वह आदित्यलोक संख्यामें इक्कीसवाँ है। जैसा कि "बारह महीने, पाँच ऋतुएँ, तीन ये लोक और इक्कीसवाँ वह आदित्यलोक', इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है। बचे हुए बाईसवें अक्षरद्वारा वह मृत्यु यानी आदित्यलोकसे परे उत्कृष्ट लोकको जीत लेता यानी प्राप्त कर लेता है। उस आदित्यलोकसे जो परे है वह क्या है ? वह नाक है—क सुखको कहते हैं उसका प्रतिषेधक अक है, वह जिसमें न हो उसे नाक कहते हैं; अर्थात् मृत्युका विषय न होनेके कारण वह क (सुख) ही है। तथा वह विशोक—शोकरहित अर्थात् मानसिक दुःखसे हीन है। उसी (लोक) को वह प्राप्त कर लेता है ॥ ५ ॥

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संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
उक्तस्यैव पिण्डितार्थमाह—श्रुति ऊपर कही हुई बातका ही सारांश कहती है—