छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यतेऽतिरिच्यते। तेन वैषम्ये प्राप्ते साम्नः समत्वकरणायाह तदेकमपि सदक्षरमिति त्र्यक्षरमेव भवति। अतस्तत्समम् ॥ ३ ॥ | 'उद्गीथ' यह नाम तीन अक्षरोंवाला है और 'उपद्रव' यह चार अक्षरोंवाला। तीन-तीन अक्षरोंसे ये समान हैं, किंतु एक अक्षर बच रहता है यानी बढ़ता है। उसके कारण इनमें विषमता प्राप्त होनेपर सामका समत्व करनेके लिये श्रुति कहती है कि वह एक होनेपर भी 'अक्षर' है, इसलिये वह नाम भी तीन अक्षरोंवाला ही है। अतः उन्हींके समान है ॥ ३ ॥ |
निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥
'निधन' यह नाम तीन अक्षरोंका है, अतः यह उनके समान ही है। वे ही ये बाईस अक्षर हैं ॥ ४ ॥
| निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति। एवं त्र्यक्षरसमतया सामत्वं संपाद्य यथाप्राप्तान्येवाक्षराणि संख्यायन्ते। तानि ह वा एतानि सप्तभक्तिनामाक्षराणि द्वाविंशतिः ॥ ४ ॥ | 'निधन' यह तीन अक्षरोंवाला नाम है, अतः यह उनके समान ही है। इस प्रकार तीन अक्षरोंमें समानता होनेके कारण उनका सामत्व सम्पादित कर इस प्रकार प्राप्त हुए अक्षरोंकी गणना की जाती है—निश्चय ही वे ये सात भक्तियोंके नामाक्षर बाईस हैं ॥ ४ ॥ |
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