भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 978 में से

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पृष्ठ 187

खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ १८३


| भक्तेस्त्र्यक्षरमेव नाम तत्पूर्वेण समम् ॥ १ ॥ | ‘प्रस्ताव’ यह प्रस्तावभक्तिका नाम भी तीन अक्षरोंवाला ही है, अतः यह पहले नामके समान है ॥ १ ॥ |

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आदिरिति द्व्यक्षरं प्रतिहार इति चतुरक्षरं तत इहैकं तत्समम् ॥ २ ॥

‘आदि’ यह दो अक्षरोंवाला नाम है और ‘प्रतिहार’ यह चार अक्षरोंवाला नाम है। इसमेंसे एक अक्षर निकालकर आदिमें मिलानेसे वे समान हो जाते हैं ॥ २ ॥

| आदिरिति द्व्यक्षरं सप्तविधस्य साम्नः संख्यापूरण ओङ्कार आदिरित्युच्यते । प्रतिहार इति चतुरक्षरम् । तत इहैकक्षरमवच्छिद्याक्षरयोः प्रक्षिप्यते । तेन तत्सममेव भवति ॥ २ ॥ | ‘आदि’ यह दो अक्षरोंवाला है। सात प्रकारके सामकी संख्याको पूर्ण करनेमें ओङ्कार ‘आदि’ इस नामसे कहा जाता है। तथा ‘प्रतिहार’ चार अक्षरोंवाला नाम है। यहाँ उसमेंसे एक अक्षर निकालकर आदिके दो अक्षरोंमें मिला दिया जाता है। इससे वह उसके समान ही हो जाता है ॥ २ ॥ |

—: ०० :—

उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यते त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ ३ ॥

‘उद्गीथ’ यह तीन अक्षरोंका और ‘उपद्रव’ यह चार अक्षरोंका नाम है। ये दोनों तीन-तीन अक्षरोंमें तो समान हैं; किंतु एक अक्षर बच रहता है। अतः [ ‘अक्षर’ होनेके कारण ] तीन अक्षरोंवाला होनेसे तो वह [ एक ] भी उनके समान ही है ॥ ३ ॥