भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 186
१८२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| यथा प्रथमेऽध्याय उद्गीथभक्ति-<br>नामाक्षराण्युद्गीथ इत्युपास्यत्वे-<br>नोक्तानि, तथेह साम्नः सप्त-<br>विधभक्तिनामाक्षराणि समाहृत्य<br>त्रिभिस्त्रिभिः समतया सामत्वं<br>परिकल्प्योपास्यत्वेनोच्यन्ते ।<br><br>तदुपासनेन मृत्युगोचराक्षर-<br>संख्यासामान्येन तं मृत्युं प्राप्य<br>तदतिरिक्ताक्षरेण तस्यादित्यस्य<br>मृत्योरतिक्रमणायैव संक्रमणं<br>कल्पयति । अतिमृत्यु सप्तविधं<br>सामोपासीत मृत्युमतिक्रान्त-<br>मतिरिक्ताक्षरसंख्ययेत्यतिमृत्यु<br>साम । तस्य प्रथमभक्तिनामा-<br>क्षराणि हिङ्कार इत्येतत्त्र्यक्षरं<br>भक्तिनाम । प्रस्ताव इति च | करे—यह बतलाया जाता है ] जिस<br>प्रकार प्रथम अध्यायमें उद्गीथभक्ति<br>के नामके अक्षर 'उद्गीथ हैं' इस<br>प्रकार उपास्यरूपसे बतलाये गये हैं,<br>उसी प्रकार यहाँ सामकी सात<br>प्रकारकी भक्तियोंके नामोंके अक्षरोंको<br>एकत्रित कर तीन-तीन अक्षरोंद्वारा<br>समत्व होनेके कारण उनके सामत्व-<br>की कल्पना कर उन्हें उपास्यरूपसे<br>बतलाया जाता है ।<br><br>मृत्युके विषयभूत अक्षरोंकी संख्या<br>[जो इक्कीस है उस] की सदृशताके<br>कारण उन अक्षरोंकी उपासना करनेसे<br>मृत्यु (आदित्य) को प्राप्तकर उनसे<br>अतिरिक्त अक्षरद्वारा उस आदित्यरूप<br>मृत्युके अतिक्रमणके लिये ही श्रुति<br>[ उपासकके ] संक्रमणकी कल्पना<br>करती है* [ श्रुतिमें जो कहा है<br>कि ] अतिमृत्यु सप्तविध सामकी<br>उपासना करे सो अतिरिक्त अक्षर-<br>संख्या (बाईसवीं) के द्वारा मृत्युका<br>अतिक्रमण करनेके कारण साम<br>अतिमृत्यु है । उस सामकी प्रथम<br>भक्तिके नामाक्षर 'हिंकार' हैं, यह<br>भक्तिनाम तीन अक्षरोंवाला है; तथा |


* यह बात आगे पाँचवें मन्त्रमें स्पष्ट कर दी गयी है।