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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 195 of 978

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Page 195

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १९१


| शयनं स्त्रियोऽभिमुखीभावः स प्रतिहारः। कालं गच्छति मैथुनेन पारं समाप्तिं गच्छति तन्निधनम् । एतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम्, वाय्वम्बुमिथुनसम्बन्धात् ॥१॥ | सन्तानकी प्राप्तिका हेतु होनेके कारण) वह उत्कृष्ट है। अपनी अनेक पत्नियोंमेंसे प्रत्येकके साथ जो शयन करना—सम्मुख या अनुकूल होना है, वह प्रतिहार है। पुरुष मिथुनद्वारा जो समय बिताता है तथा मैथुनक्रियाकी जो समाप्ति करता है, वह निधन है। यह वामदेव्य साम मिथुनमें ओतप्रोत है; क्योंकि वायु और जलके मिथुन (जोड़े) से इसका सम्बन्ध है ॥ १ ॥ |


स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न काञ्चन परिहरेत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥

जो पुरुष इस प्रकार इस वामदेव्य सामको मिथुनमें ओतप्रोत जानता है, वह मिथुनवान् (दाम्पत्य-सुखसे सम्पन्न) होता है, प्रत्येक मैथुनसे संतानको जन्म देता है। सारी आयुका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन बिताता है। प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। जिस उपासकके अनेक पत्नियाँ हों वह उनमेंसे किसीका भी परित्याग न करे, यह (वामदेव्योपासकका) व्रत है ॥ २ ॥

| स य इत्यादि पूर्ववत्। मिथुनी भवत्यविधुरो भवतीत्यर्थः। मिथुनान्मिथुनात्प्रजायत इत्यमोघरेतस्त्वमुच्यते। न काञ्चन काञ्चिदपि स्त्रियंस्वात्मन्नन्यप्राप्तां न परिहरेत्स- | 'स यः' इत्यादि मन्त्रभागका अर्थ पूर्ववत् है। मिथुनवान् होता है अर्थात् कभी विधुर (पत्नीके संयोग-सुखसे वञ्चित) नहीं होता है। मिथुन-मिथुनसे संतानको जन्म देता है, इस कथनके द्वारा उसकी अमोघवीर्यता बतायी जाती है। अपनी बहुत-सी स्त्रियोंमेंसे जो कोई जब कभी समागमकी इच्छा लेकर अपनी शय्यापर आ जाय, उसका परित्याग न |