छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 194, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| १९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| तेजो ब्रह्मवर्चसम्, तेजस्तु केवलं त्विड्भावः । अन्नादो दीप्ताग्निः । न प्रत्यङ्ङग्नेरभिमुखो नाचामेन भक्षयेत्किञ्चिन्न निष्ठीवेच्च श्लेष्मनिरसनं च न कुर्यात्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | निमित्तसे प्राप्त हुआ तेज 'ब्रह्मवर्चस्' कहलाता है, केवल तेज तो त्विङ्-भाव ( कान्ति ) का नाम है। 'अन्नाद' का अर्थ दीप्ताग्नि है। अग्निकी ओर मुख करके आचमन यानो कुछ भी भक्षण न करे और न निष्ठीवन—श्लेष्मा ( कफ ) का ही त्याग करे—यह व्रत है ॥ २ ॥ |
—: ० :— इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥ —: ० :—
त्रयोदश खण्ड
वामदेव्यसामकी उपासना
उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमे तद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् १
पुरुष जो संकेत करता है, वह हिंकार है; जो तोष देता (प्रसन्न करनेके लिये मीठी बातें कहता) है, वह प्रस्ताव है; स्त्रीके साथ जो सोता है वह उद्गीथ है; अपनी अनेक पत्नियोंमेंसे प्रत्येकके साथ जो शयन (अनुकूल बर्ताव) करता है, वह प्रतिहार है; मिथुनद्वारा जो समय बिताता है, वह निधन है; मैथुन आदि क्रियाकी जो समाप्ति करता है, वह भी निधन ही है, यह वामदेव्य साम मिथुनमें ओत-प्रोत है ॥ १ ॥
| उपमन्त्रयते संकेतं करोति प्राथम्यात्स हिंकारः। ज्ञपयते तोषयति स प्रस्तावः। सहशयनमेकपर्यङ्कगमनं स उद्गीथः श्रैष्ठ्यात्। प्रतिस्त्रीं | पुरुष जो उपमन्त्रण—संकेत करता है, वह प्रथम होनेसे हिंकार है। जो ज्ञापन करता—मीठी बातें कह-कर तोष देता है, वह प्रस्ताव है। स्त्री-पुरुषका जो साथ सोना—एक शय्यापर जाना है, वह उद्गीथ है, क्योंकि उत्तम |